भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 401

२४ ३ अ० ४ पा० २ खं० । औपमन्यव आचार्य मानते हैं। अथवा यजुर्मन्त्र इसे अन्त तक पहुँचाते हैं। आगे 'ऋत्विज्' के आठ (८) नाम हैं। 'ऋत्विक्' क्यों है ? स्तुतियोंको ईरण करता है, (बोलता है) ऋचाओंसे यज्ञ कराता है,-इससे 'ऋत्विज्' है" यह शाकपूणि आचार्य मानते हैं। अथवा ऋतुमें यजन करता है। आगे याच्ञा (माँगने) अर्थमें सत्तरह (१७) धातु ह। आगे दान अर्थमें दश (१०) धातु हैं। आगे आज्ञा अर्थ (प्रेरणा अर्थ) में चार (४) धातु हैं। 'स्वप्' 'सस्' ये दो धातु स्वप्न अर्थमें हैं। आगे कूपके चौदह (१४) नाम हैं। 'कूप' क्यों है ? कुपान (जिसमें कष्टसे पान) होता है। अथवा क्रोध अर्थमें 'कुप्' (दि० प०) धातुसे है। [क्योंकि इसके पास जाकर प्यासे जन कोप करते हैं।] आगे स्तेन (चोर) के चौदह (१४) ही नाम हैं। 'स्तेन' क्यों है ? "इसमें पापकर्म इकट्ठा रहता है" यह नैरूक्त मानते हैं। आगे निर्णीत (निर्णय किये हुए) और अन्तर्हित (छुपे हुए) के छः (६) नाम हैं। ['निर्णीत' क्यों है ? धोया हुआ जैसा होता है।] आगे दूरके पाँच (५) नाम हैं। 'दूर' क्यों है ? द्रुत (गया हुआ) होता है। अथवा दुरय या दुःखसे मिलता है। आगे पुराण (पुराने) के छः (६) नाम हैं। 'पुराण' क्यों है ? पहले नया होता है। आगे नव (नये) के छः (६) ही नाम हैं। 'नव' क्यों है ? लाया हुआ होता है ॥ २ ॥ (१६)