निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
२४ ३ अ० ४ पा० २ खं० । औपमन्यव आचार्य मानते हैं। अथवा यजुर्मन्त्र इसे अन्त तक पहुँचाते हैं। आगे 'ऋत्विज्' के आठ (८) नाम हैं। 'ऋत्विक्' क्यों है ? स्तुतियोंको ईरण करता है, (बोलता है) ऋचाओंसे यज्ञ कराता है,-इससे 'ऋत्विज्' है" यह शाकपूणि आचार्य मानते हैं। अथवा ऋतुमें यजन करता है। आगे याच्ञा (माँगने) अर्थमें सत्तरह (१७) धातु ह। आगे दान अर्थमें दश (१०) धातु हैं। आगे आज्ञा अर्थ (प्रेरणा अर्थ) में चार (४) धातु हैं। 'स्वप्' 'सस्' ये दो धातु स्वप्न अर्थमें हैं। आगे कूपके चौदह (१४) नाम हैं। 'कूप' क्यों है ? कुपान (जिसमें कष्टसे पान) होता है। अथवा क्रोध अर्थमें 'कुप्' (दि० प०) धातुसे है। [क्योंकि इसके पास जाकर प्यासे जन कोप करते हैं।] आगे स्तेन (चोर) के चौदह (१४) ही नाम हैं। 'स्तेन' क्यों है ? "इसमें पापकर्म इकट्ठा रहता है" यह नैरूक्त मानते हैं। आगे निर्णीत (निर्णय किये हुए) और अन्तर्हित (छुपे हुए) के छः (६) नाम हैं। ['निर्णीत' क्यों है ? धोया हुआ जैसा होता है।] आगे दूरके पाँच (५) नाम हैं। 'दूर' क्यों है ? द्रुत (गया हुआ) होता है। अथवा दुरय या दुःखसे मिलता है। आगे पुराण (पुराने) के छः (६) नाम हैं। 'पुराण' क्यों है ? पहले नया होता है। आगे नव (नये) के छः (६) ही नाम हैं। 'नव' क्यों है ? लाया हुआ होता है ॥ २ ॥ (१६)
हिन्दी निरुक्त । ६५ ( खं० ३ ) [ निघ०७-] प्रपित्वे ( १ ) । अभीके ( २ ) । दभ्रम् ( ३ ) । अर्भकम् ( ४ ) तिरः ( ५ ) । सतः । ( ६ ) । त्वः ( ७ ) । नेमः ( ८ ) । ऋक्षाः ( ६ ) । स्तृभिः ( १० ) । वम्रीभिः ( ११ ) । उपजिह्विका ( १२ ) ऊर्दरम् ( १३ ) । कृदरम् ( १४ ) । रम्भः ( १५ ) । पिनाकम् ( १६ ) । मेनाः ( १७ ) । ग्नाः ( १८ ) । श्नेपः ( १९ ) । वैतसः ( २० ) । अया ( २१ ) । एना ( २२ ) । सिषक्तु ( २३ ) । सचते ( २४ ) । भ्यसते ( २५ ) रेजते ( २६ ) । इति षड्विंशतिर्द्विद्य उत्तराणिनामानि २८ । [ निघ०-] स्वधे ( १ ) । पुरन्धी ( २ ) । धिषणे ( ३ ) । रोदसी ( ४ ) । क्षोणी (५) । शम्भसी (६) । नभसी ( ७ ) । रजसी ( ८ ) । सदसी ( ६ ) । सद्मनी ( १० ) । घृतवती ( ११ ) । बहुले ( १२ ) । गभीरे ( १३ ) । गम्भीरे (१४) । ओरायो ( १५ ) । चम्वौ (१६) । पार्श्वो ( १७ ) । मही ( १८ ) । उर्वी ( १८ ) । पृथ्वी ( २० ) । अदिती ( २१ ) । मही ( २२ ) । दूरेअन्ते ( २३ ) । अपारे ( २४ ) ।
३६ ३ अ० ४ पा० ३ खं० । अपारे–इति चतुर्विंशतिर्द्यावापृथिवीनामधेयानि ॥ ३० ॥ उरु ( १ ) । बृहन् ( २ ) । महत् ( ३ ) । गयः ( ४ ) । इरज्यति ( ५ ) । शिम्बाता ( ६ ) । निर्णिंक् ( ७ ) । अस्रेमाः ( ८ ) । केतुः ( ९ ) । बट् ( १० ) । विवयत् ( ११ ) । हिकम् ( १२ ) । इदमिव ( १३ ) । अर्वति ( १४ ) । विप्रः ( १५ ) । रेभः ( १६ ) । यऊजः ( १७ ) । मारुताः ( १८ ) । ईमहे ( १९ ) । दाति ( २० ) । परिस्त्रव ( २१ ) स्वपिति ( २२ ) । कूपेः ( २३ ) । तृपुः ( २४ ) । निरायम् ( २५ ) । आके ( २६ ) । प्रत्नम् ( २७ ) । नवम् ( २८ ) । प्रपित्वे ( २९ ) । स्वधे ( ३० ) त्रिंशत् ( ३१ ) ॥ इति निघण्टौ तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
हिन्दी निरुक्त । ३७ [निरुक्तम्-] द्विश उत्तराणि नामानि । प्रपित्वे } इति आसन्नस्य [ नामनी ] [ पदार्थः ] अभीके } 'प्रपित्वे' प्राप्ते 'अभीके' अभ्यक्ते । “आपित्वे नः प्रपित्वे तूय मागहि” [ ऋ० सं० ५, ७, ३, ३ ] “अभीके चिदु लोककृत्” [ ऋ० सं० ८, ७, २१, १ ] इत्यपि निगमौ भवतः । दभ्रम् } इति अल्पस्य [नामनी] { 'दभ्रं' दभ्नोतेः । सुदम्भं भवति । अर्भकम् } { 'अर्भकम्'अवहतं भवति । “उपोप मे परामृश मा मे दभ्राणि मन्यथाः” [ ऋ० सं० २, १, ११, ७ ] “नमो महद्भ्यो नमो अर्भकेभ्यः” [ ऋ० सं० १, २, २४, ३ ] इत्यपि निगमौ भवतः । तिरः } -इति प्राप्तस्य { 'तिरः' तीर्णं भवति । सतः } { 'सतः' संसृतं भवति । “तिरश्चिदर्यया परिवर्त्ति याति सदान्वा” [ ऋ० सं० ४, ४, १६, २ ]
३८ ३ अ० ४ पा० ३ खं० । “पात्रेव भिन्दन् सत एति रक्षसः ।” [ ऋ० सं० ५, ७, ६, १ ] इत्यपि निगमौ भवतः । त्वः } इति अर्द्धस्य } ‘त्वः’ अपततः । नेमः } ‘नेमः’ अपनीतः । ‘अर्द्धं हरते वि॑िपरी॑तात् । हारयतेर्वा स्यात् । उद्धृतं भवति । ऋध्नोतेर्वा स्यात् । ऋद्धतमो विभागः । ”पीयातित्वो अनु त्वो गृणाति” [ ऋ० सं० २, २, १६, २ ] “नेमे देवा नेमेऽसुराः” [ ब्राह्मणम् ] वाजपेये मैत्रायणीयानाम् । इत्यपि निगमौ भवतः । ऋक्षाः } इति नक्षत्राणाम् । } ‘नक्षत्राणि’ नक्षतेर्गतिकर्मणः । स्तृभिः } “नेमानि नक्षत्राणि” इति च ब्राह्मणम् । ‘ऋक्षाः’ उदीर्णानीव ख्यायन्ते । ‘स्तृभिः स्तीर्णाऽीव ख्यायन्ते । “अमीय ऋक्षा निहिता स उच्चा ।” [ ऋ० स० १, २, १४, ५ ] “पश्यन्तो द्यामिव स्तृभिः । [ ऋ० सं० ३, ४, ६, ३ ]
१०८ ३ अ० ४ पा० ४ खं० । [ खं० ४ ] रम्भः \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ {'रम्भः' आरभन्ते एनम् । \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ } इति दण्डस्य पिनाकम् “आ त्वा रम्भं न जिभ्रयो ररम्भ” [ ऋ० सं० ३, ४५, ५ ] इत्यपि निगमो भवति । आरभामहे त्वा जीर्णा इव दण्डम् [ निगमार्थः ] \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ {'पिनाकम्' प्रतिपिनष्टि एनेन । “कृत्तिवासा पिनाकहस्तोऽवततधन्वा” इत्यपि निगमो भवति । [ य० वा० सं० ३, ६१ ] मेनाः \ \ } \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ {'स्त्रियः' स्त्यायतेः अपत्रपणकर्मणः । \ \ \ \ \ \ \ \ \ } इति स्त्रीणाम् । \ \ \ \ {'मेनाः' मानयन्ति एनाः । 'ग्नाः' ग्नाः \ \ \ \ } \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ गच्छन्ति एनाः । “अमेनांश्चिज्जनिवतश्चकर्थ ,” [ ऋ० सं० , १, २१, २, ] “ग्नास्त्वा कृन्तन्नपसोऽतन्वत ।” [ सा० कौ० शा० १, १, ८ ] इत्यपि निगमौ भवतः । शेपः \ \ \ \ } \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ {'शेपः' शपतेः स्पृशीत कर्मणः । \ \ \ \ \ \ \ \ \ } इति पुंस् प्रजननस्य । \ { वैतसः \ } \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ {'वैतसः' वितस्तं भवति ।
हिन्दी निरुक्त । १०१ “यस्या सुशन्तः प्रह्वराम शेपम् ।” ऋ० स० १, ३, २७, २] “चिः स्म मा न्हः श्लथयेः बेतसेन” ऋ० सं० ८, ५, १, ५] इत्यपि निगमौ भवतः । अया } एना } इति उपदेशस्य । “अया ते अग्ने समिधा विधेम”- ति स्त्रियाः । ऋ० ३, ४, २५, ५] “एना वो अग्निम्”-इति नपुंसकस्य । [ऋ० सं० ५, २ २१, १] “एना पत्या तन्वं १ संसृजस्व”-इति पुंसः । [ऋ० सं० ८, ३, २५, २] सिषक्तु } सचते } इति सेवमानस्य । “स नः सिषक्तु यस्तुर ।” [ऋ. स. १, १, ३४, २] “सचस्वानः स्वस्तये” [ऋ० सं० १, १, २, ४] 'स नः सेवतां यस्तुरः ।' { 'सेवस्वः नः स्वस्तये ' { इति क्रमेण निगमयोरर्थौ : } ‘स्वस्ति’ इति अविनाशिनाम । अस्तिः-अभि पूजितः सु अस्तीति ।
१०२ ३ अ० ४ पा० ४ खं० ।
भ्यसते
रेजते / इति भयचलनयोः ।
“यस्य शुष्माद् रोदसी अभ्यसेताम् ।”
[ ऋ० सं० २-६-७-१ ]
“रेजते अग्ने पृथिवी मखेभ्यः ।”
[ ऋ० सं० ५-१-२-४ ]
- इत्यपि निगमौ भवतः ।
द्यावापृथिवी नामधेयानि उत्तराणि चतुर्विंशतिः
तयो रेषा भवति ॥ ४ ॥ ( २१ )
अर्थ ।
आगे एक एक वस्तुके दो दो नाम नाम हैं, [ जैसे-
प्रपित्वे
/ ये आसन्न या समीपमें रहनेवालेके दो नाम हैं । अभीके / ‘प्रपित्वा’ नाम प्राप्त और ‘अमीक’ नाम अभ्यक्त या पासमें लगे हुए का है । (१) “हे इन्द्र ! पान कालके प्राप्त होते ही तुम हमारे यहाँ शीघ्र आओ” । (२) संग्राम कालके प्राप्त होनेपर इन्द्र
उपस्थित होता है । / ये भी निगम हैं” दभ्र
/ ये अल्प (थोड़े) के नाम हैं । अर्भक /
हिन्दी निरुक्त । १०३ 'दस्र' वधार्थक '०स्म' (स्वा० प०) धातुसे है। क्योंकि वह सहजमें काटा जा सकता है। 'अर्भक' क्यों ? कम हुआ हुआ होता है। अर्थात् ह्रस्व या छोटा। "उपोपमे.... सर्शोह मस्मि रोमशा गन्धारीणामिवाविका" अर्थात्-रोमशा नाम बृहस्पतिकी पुत्री परिहास करते हुये अपने पतिके प्रति कहती है कि-हे पति ! 'उप' पास आकर 'उप' आलि ङ्गन करके मेरे ( अङ्ग ) को तुम छूओ। 'मे' मेरे अङ्गोंको 'दश्राणि'- अल्प 'मा' मत 'मन्यथाः' मानो। ( क्योंकि 'अहम्' मैं 'सर्वा' सारी या सब अङ्गोंमें 'रोमशा' रोमयुक्त 'अस्मि' हूं। 'इव' जिस प्रकार 'गन्धारीणाम्' गन्धार देशकी भेड़ोंमें 'रोमशा' अच्छे रोमों वाली 'अविका' कोई भेड़ होती। "नमो महद्भ्यः"......... : अर्थात, 'बड़ोंको नमस्कार, छोटोंको नमस्कार। ये दो इन ('दस्र' 'अर्भक' ) दो शब्दोंके निगम हैं। तिरः \Bigg} ये दो प्राप्तके नाम हैं। सतः / 'तिरः' तीर्ण ( तर गया हुआ ) होता है। 'सतः' संसृत ( फैला हुआ ) होता है। “तिरश्चिदर्यया"......... । 'हे अश्विनो ! तुम स्थान प्राप्त होने पर भी उसे छोड़ कर, किसी कार्यमें रहते हुए भी उसे बदल कर शीघ्र गतिसे आओ। जो तुम 'अदाभ्य' किसीसे हिंसा नहीं किये जा सकते।' “पात्रेव"............. ।
१०४ ३ अ० ४ पा० ४ खं० ।
हे इन्द्र ! तुम “पात्रा इव भिन्दन्” लाठीसे मिट्टीके बर्तनोंको
फोड़ते हुएके समान “रक्षसः' 'भिन्दन्' राक्षसोंको मारते हुए
“सतः” प्र स दूर देशसे “एति” मेरे यज्ञमें आओ ।
ये भी दो निगम हैं। [अपि शब्दसे ओर निगमोंकी सूचना है।
त्वः
नेमः ⎭ ये दो अर्द्ध (आधे) के हैं।
त्व' 'अपैत्य ततः' हट कर विस्तृत है ।
'नेम' काट कर नीत या अलग किया है ।
अर्द्ध' विपरीत 'हृ' (भ्वा० उ०) धातुसे है । अथवा 'हारि'
(हृ-णिच्) (चु० उ०) धातुसे है, क्योंकि वह उद्धृत या निकाला
हुआ होता है। अथवा ऋध् (स्वा० प०) से है। [क्योंकि]
वह ऋद्धतम या बहुत बढ़ा हुआ विभाग है।
'पीयति त्वो”......... ।
अर्थात् हे अग्ने ! दो भागोंमें बटे हुए, प्रजापतिसे उत्पन्न हुए,
देवताओं और असुरोंमेंसे 'त्वः' आधा असुर भाग तेरे तन्को
'पीयति' हिंसा करता है और त्वः' आधा देवभाग 'अनुगृणाति'
स्तुति करता है।
“नेमे देवाः नेमेऽसुराः” ...... ।
अर्थात् 'नेमे' आधे 'देवाः' देव 'नेमे' आधे 'असुराः' असुर
हुए।
ये भी दो निगम होते हैं।
ऋक्षाः
स्तृभिः ⎭ ये दोनों नक्षत्रोंके नाम हैं।
'नक्षत्र' गति अर्थमें 'नक्ष' (भ्वा० प०) धातुसे है ।
हिन्दी निरुक्त। १०५
किन्तु ब्राह्मण-‘इमानि’ ये ‘नक्षत्राणि’ घृत ‘न’ नहीं हैं, किन्तु
घृतसदृश हैं। अर्थात् सूर्य्यके किरण लगनेसे सुवर्णके समान
चमकते हैं।”
‘ऋक्षाः’ क्यों ? उदीर्ण या किसीसे आधे किये हुए जैसे
दिखाई देते हैं।
‘स्तृभिः’ क्यों ? स्तीर्ण या फैले हुए जैसे दिखाई देते हैं।
“अमी ये”………… । अर्थात्
“अमूनि” वे ‘यानि’ जो ‘ऋक्षा’ नक्षत्र ‘उच्चा’ ऊंचे ‘निहितास’
रखे हुए हैं।”
“पश्यन्तो………… ।”
“हे अग्ने ! ‘स्तृभिः’ नक्षत्रोंसे ‘द्याम्-इव’ द्युलोक को जैसे
‘पश्यन्तः’ देखते हुए हम तुम्हे स्तुति करते हैं।
वम्री
$\Big}$ ये दो सोमिकाओं या चींटियोंके नाम हैं।
उपजिह्विका /
‘वम्री’ क्यों ? वमन करनेसे ।
‘सीमिका’ क्यों ? स्यमन या नित्यगमन करनेसे ।
‘उपजिह्विका’ क्यों ? उपघ्राण या सूंघनेसे ।
“यदत्त्युप”………… ”। अर्थात्—
“उपजिह्विका” चींटे ‘यत्’ जो ‘आंत्त’ भीतर घुस कर खातो
हैं। और ‘वम्रः’ किसी प्रकारकी चींटी (दामक) ‘यत्’ जिसे
‘अतिसर्पति’ गीली मिट्टीसे लपेटती हुई व्यापन करतो है, हे अग्नि-
देव ! ‘तत्’ वह ‘सर्वम्’ सब ‘ते’ तेरे लिये ‘घृत’ वो ‘अस्तु’ हो।
ऊर्दर
$\Big}$ ये दो ‘आवपन’ कोठी अथवा थैलेके नाम हैं।
कृदर /
१४
१०६ ३ अ० ४ पा० ४ खं० ।
'ऊर्दर' क्यों ? उद्दीर्ण या ऊपरसे फटा हुआ होता है । अथवा
बलके लिये फटा रहता है ।
"तमूर्दरं न......... । अर्थात्
हे अध्वर्युओं ! यव अन्नसे कोठोके समान सोमसे इन्द्रको पूर्ण
कर दो—जिस प्रकार कोई पुरुष यव अन्नसे कोठोको पूरण करता
है, वैसे ही तुम सोमसे इन्द्रको पूर्ण करो । [ यह 'पूरयति' पदकी
संगतिके लिये है । ]
'कुदर' क्यों ? कुतद्दर या उसमें द्वार किया हुआ होता है ।
"समिद्धो......... ।" अर्थात् 'समिद्धः' प्रज्वलित हुआ
देवताओंके 'मतीनाम्' मतियोंके 'कुदरम्' फैले रूप । [ क्योंकि
लिप्सासे उनकी बुद्धि वहाँ आकर ठहरती है। घृतको 'अञ्जन'
अपनी ओर ले जाता हुआ, यह भी निगम है ।
४र्थ खण्ड ।
रम्भ
पिनाक } ये दो दण्डके नाम हैं ।
'रम्भ' क्यों ? इसे मर्यादासे न गिरनेके लिये आरम्भ करते हैं।
"आ त्वारम्भं......... । अर्थात् –
"हे इन्द्र ! 'जिव्रयः' वृद्ध 'रम्भं न' लाठीको जैसे (वयम्
हम ) 'त्वा' तुझे 'आ' रभामहे' आरम्भ या आश्रयण करते हैं ।
'पिनाक' क्यों ? इससे अपराधोको प्रतिपेषण या मारा
जाता है ।
"कृत्तिवासाः......... ।"
[ "एषते रुद्र भागस्तेनावसेन परोमूजवतोऽवोह ।
अवततधन्वा पिनाक-हस्तः कृत्तिवासा" ]
[ य० वा० सं० ३, ६१, ]
हिन्दी निरुक्त । १०७ “हे रुद्र ! तेरे लिये यह भाग है, इस पथवाड़ेको लेकर तुम धनुषको कन्धे पर रखकर हाथमें पिनाक या लाठी लेकर चर्मवस्त्र को धारण किये हुए मूजवान् पर्वतसे परे चले जाओ ।” यह भी निगम है । मेना \Bigg} ये दो स्त्रियोंके नाम हैं । ग्ना ‘स्त्री’ लज्जार्थक ह्यै (भ्वा० प०) धातुसे है । (क्योंकि-प्राय वे लज्जावाली होती हैं ।] ‘मेना’ क्यों ? इन्हें पुरुष मान करते हैं । ‘ग्ना’ क्यों ? इन्हें पुरुष मान करते हैं । “अमेनांश्चित्............ ।” अर्थात्— “हे इन्द्र ! तुम स्त्री रहितोंको भी अपने भक्तोंको स्त्रीको उत्पन्न करनेवाले बनाते हो ।” “ग्नास्त्वा............।” अर्थात्— “हे वस्त्र ! “ग्नाः त्वा अकृन्तन्” स्त्रियोंने तुझे काता है । “अपसः अतन्वत” जुलाहेके छोटे छोटे लड़कोंने तुझे तना है ।”— ये भी दो निगम हैं । शेप \Bigg} ये दो पुंस् प्रजनन (लिङ्ग) के नाम हैं । वैतस ‘शेप’ क्यों ? स्पर्श अर्थमें ‘शप्’ (भ्वा० प०) धातुसे है । [क्योंकि इससे स्त्रीको स्पर्श किया जाता है।] ‘वैतस’ क्यों ? स्त्रीके स्मरणसे पहले ‘वितस्त’ या सङ्कुचित होता है । “यस्यामुशन्तः.........।” अर्थात्— “हे भगवन् ! पूषन् ! जिस योनिमें पुत्रको कामना करते हुए हम शेप या लिङ्गका प्रहार करते हैं ।”
१०८ ३ अ० ४ पा० ४ खं० । “त्रिः स्म……………” । इस मन्त्रमें उर्वसी और पुरूरवाकी पुराण प्रसिद्ध कथाका मूल है। पुरूरवाने उर्वशीसे कहा-कि-'तू मत जा, ठहर, उस पर उर्वशीने कहा कि—“हे पुरूरवः ! 'अन्हः' दिनके 'त्रिः' तीनवार 'त्वम्' तूने 'मा' मुझे 'वैतसेन' शिश्नदण्डसे 'श्नथयः' ताडन किया है”…………इत्यादि । ये भी दो निगम हैं । अया } एना } ये दो उपदेशके नाम हैं । [ यह उपदेश स्त्री पुंस और नपुंसक तीनों लिङ्गोंमें आता है ।] 'अया ते…………” । अर्थात्– “हे अग्ने ! भगवन् ! 'अया' अनया 'समिधा' इस समिध् से 'ते' तेरो 'विधेम' परिचर्या करते हैं ।” 'अया' यह समिध् के साथ स्त्री लिङ्ग है । “एना वो अग्निम्”………… । अर्थात्– “मैं 'वः' 'एना' 'नमसा' तुम्हारे इस प्रस्तुत अन्नसे 'अग्निम्' 'आहुवे' अग्निको बुलाता हूं ।” 'एना' यह 'नमसा' नपुंसक पदके साथ नपुंसकका उपदेश है । “एना पत्या तन्वं व संसृजस्व”………… । अर्थात्– “हे वधु ! इस पतिसे अपने तन् ( शरीर ) को मिला दे ।” 'एना' यह पति शब्दके साथ पुलिङ्ग उपदेश है। सिषक्तु } सचते } ये दो सेवाके वाचक हैं । “सनः सिषक्तु………… ।” अर्थात्– 'वह हमारी सेवा करे, जो शीघ्रकारी हो ।'
हिन्दी निरुक्त । १०६
"सचस्वानः स्वस्तये…………।" अर्थात्—
'हमारे कल्याणके अर्थ संयुक्त हो।'
'स्वस्ति' यह अविनाशी (नहीं नष्ट होनेवाले) का नाम है।
अस् (अदा० प०) धातु प्रशंसा अर्थमें है। 'सु' और 'अस्ति' से
स्वस्ति शब्द बना है।
भ्यसते
रेजते } ये दो धातु भय और वेपन या कम्पन अर्थमें हैं।
"यस्य शुष्माद् रोदसी…………।" अर्थात्—
"जिसके क्रोधसे पृथिवी और द्युलोक काँपते हैं, या डरते हैं।"
( "प्रचित्र मर्कः" ) 'रेजते अग्ने पृथिवी मखेभ्यः" । अर्थात्-
"हे अग्ने ! 'मखेभ्यः' जिन पूजनीय मरुतोंसे 'पृथिवी' 'रेजते'
काँपती या डरती है।"
ये दो निगम हैं।
आगे द्यावा पृथिवी ( द्युलोक और भूलोक ) के चौबीस ( २४ )
नाम हैं। उनके साहचर्य या एक साथ रहनेको कहनेवाली यह
ऋचा है ॥ ४ ॥ (२१),
( खं० ५ )
[ निरु०-] "कतरा पूर्वा कतरा परायोः कथा जाते
कवयः को विवेद ।
विश्वं त्मना बिभृतो यद्धनाम विवर्त्तते
अहनी चक्रियेव ॥" [ऋ० सं० २, ५, २, १,]
कतरा पूर्वा कतरा परा अनयोः कथं जाते कवयः
क एने विजानाति । सर्वम् आत्मना विभृतः यद्धै-
नयो कर्म विवर्त्तते च एनयोः अहनी अहोरात्रे
११० ३ अ० ४ पा० ५ खं० । चक्रयुक्ते इव,- इति द्यावापृथिव्योर्महिमानमाचष्टे आचष्टे ॥ ५ ॥ २२ ॥ इति तृतीयाऽध्याय चतुर्थः पादः ॥ ३, ४ ॥ अर्थ । “कतरा पूर्वा” मन्त्रका अगस्त्य ऋषि। त्रिष्टुप् छन्दः। यह ऋचा पृष्ठ और अभिप्लवके षष्ठ (६ ठे) दिनमें तथा महाव्रतके तृतीय सवनमें वैश्वदेव शस्त्रमे है। स्वयमेव (आप ही आप) अगस्त्य ऋषि बितर्क करता हुआ संशययुक्त होकर कहता है-इन दोनों (द्यावा पृथिवीओं) में कौन पूर्व है? और कौन अपर या पीछे हुई है? ये कैसे उत्पन्न हुई हैं? (एक साथ या आगे पीछे?) हे कवियो! कोई भी स्पष्ट-जानता है? किन्तु मै इतना शास्त्रसे कह सकता हूं कि ये हिरण्मय अण्डके दो टुकड़े हैं। जैसा कि कहा है—“अण्डकपाले रजतं च सुवर्णं चाभवताम्' तद् यद् रजतं सेयं पृथिवी यत् सुवर्णं सा द्यौः' अर्थात् अण्डेके दो कपाल या टुकड़े हुवे रजत (चाँदी) और सुवर्ण, जो वह रजत था सो यह पृथिवी, जो सुवर्ण था वह द्यौः (द्युलोक)। इससे जाना जाता है कि ये एक साथ हुए होंगे। और ये दोनों विश्व (जगत्) को अपनेसे धारण करते हैं, जिस लिये कि इनका नाम है। और इन्हींके भीतर रात्रि और दिन चक्रके समान बदलते हुवे रहते हैं। प्रयोजन यह कि-दो चक्रोंके समान ये द्यावा पृथिवी आपसमें जुड़े हुवे हैं। इस प्रकार ऋषि इस मन्त्रके द्वारा द्यावापृथिवीओंके महाभा- ग्यको कहता है।
हिन्दी निरुक्त । १११ इस प्रकार यह नैघण्टुक काण्ड समाप्त हुआ । इससे आगे ‘ऐकपदिक’ या ‘नैगम’ प्रकरण होगा । जिसका पहिला वाक्य ‘एकार्थमनेकशब्दम्’ यह है इति । व्याख्या । ( १ अ० ) उपमा दो प्रकार से आती है, एक शब्दोपमा जो पूर्व पादमें विस्तारसे दिखाई गई है ! दूसरी लुप्तोपमा या अर्थो- पमा, हैं । उपमाके स्थलमें उपमाके वाचक ‘इव’ आदि शब्दोंके रहनेसे शब्दोपमा होती है और इन्हीं इव आदि शब्दोंके लोपसे उपमा लुप्तोपमा कही जाती है । एवम् उपमा वाचक शब्दके न रहनेसे भी उसका अर्थ जो सादृश्य है प्रतीत होता है, इससे वही ‘अर्थोपमा’ कहलाती है । जैसे—‘सिंहो देवदत्तः’ अर्थात् सिंह सदृश देवदत्त है । यहाँ सिंह पदके आगे इव आदि उपमा वाचक शब्दके न रहनेसे भी उसका अर्थ सादृश्य प्रतीत होता है ।” अर्थोपमा दो प्रकारकी होती है, एक प्रशंसा में, और दूसरी निन्दामें । प्रशंसाके लिये ‘सिंह’ ‘व्याघ्र’ आदि शब्द दिये जाते हैं और निन्दाके लिये ‘श्वा’ ( कुत्ता ) ‘काक’ आदि शब्द होते हैं । जैसे ‘श्वा पुरुषः’ कुत्ते जैसा पुरुष है, इत्यादि— यद्यपि निघण्टुशास्त्रमें शब्दोपमाका ही पाठ है, किन्तु लुप्तोपमा- का नहीं इससे यहाँ भाष्यमें इसके दिखानेकी आवश्यकता नहीं थी, तथापि भाष्य ग्रन्थ विषयको विस्तारसे वर्णनके लिये ही होता है, अतः अवसर पानेसे अर्थोपमाका व्याख्यान भी कर दिया गया है । पक्षियोंके नामोंमें दो पक्ष हैं । (क) बहुत निरुक्ताचार्य मानते हैं कि-प्राय करके पक्षियोंके नाम शब्दके अनुकरण पर ही हैं, अर्थात् अर्थात् जो पक्षी जैसा शब्द करता है उसका नाम उसके समान ही होता है । जैसे काक ‘काँकाँ’ शब्द करता है इसीसे उसका नाम ‘काक’ है ।
१२२ ३ अ० ४ पा० ५२ खं० । (ख) औपमन्यव आचार्य मानते हैं कि—शब्दके अनुकरण पर कोई नाम नहीं होता, किन्तु सब नाम क्रियाके सम्बन्धसे धातु, प्रत्यय आदि संस्कार युक्त होते हैं। उसके अनुसार अपने पक्षियों तथा तिर्यक् (पशुओं) के कई नामोंकी व्युत्पत्ति भी दिखाई है। जैसे—काक तित्तिरि, कपिञ्जल [पक्षी] श्वा, सिंह, व्याघ्र। [पशु।] यद्यपि निरुक्त शास्त्र वेदाङ्ग है, और वैदिक शब्दोंके निर्वचनके अर्थ ही प्रवृत्त हुआ है, इससे इसमें सिंह, व्याघ्र, श्वा, काक ऐसे अर्वाचीन नामोंकी व्याख्या आचार्यको नहीं करना चाहिये थी, किन्तु निर्वचनके प्रकारको दिखानेके लिये कि-ऐसा भी निर्वचनका प्रकार है, इन शब्दोंकी व्याख्या की है। सिंह-‘सिंह’ शब्दमें ‘हिंस’ (रु० प०) धातुसे और सम् (उप०) तथा हन् (आ० प०) धातुके मेलसे व्युत्पत्ति कह कर दिखाया कि-शब्दोंके निर्वचन अनुलोम और प्रतिलोम दोनों प्रकार से होते हैं। पहिले निर्वचनमें हिंस् धातुके आदिका अक्षर अन्तमें आ जाता है और अन्तका आदिमें। इससे यह प्रतिलोम निर्वचन हुआ। तथा दूसरेमें सकार, हकार दोनों अक्षर जहाँके तहाँ रहे यही अनुलोम निर्वचनको प्रकार है। यह पक्ष वैयाकरणोंको भी सम्मत है। (३-१-५ खं०) इस खण्डसे पूर्व निघण्टु शास्त्रमें ऐसे ही नाम दिये हैं, जो एक एक वस्तुके बहुत बहुत नाम हैं, किन्तु यहाँसे ३ य ४र्थ, ५म खण्डोंमें एक एक वस्तुके दो दो नाम हैं, उनकी व्याख्या की है। एवम् इन्हीं शब्दोंके साथ नैघण्टुक काण्डकी समाप्ति भी हो जाती है। इसके आगे चौथे अध्यायसे दूसरा नैगम काण्ड आरम्भ होगा। “अमैनांश्चित्” मन्त्रसे अमैथुन सृष्टि जो पुराणोंमें प्रसिद्ध है, प्रमाणित होती है।
“ग्नास्त्वा” से वस्त्रके तैयार करनेकी क्रियाएं तथा उसमें स्त्री, बालक एवम् पुरुषोंका पृथक् पृथक् उपयोग दिखाया है । “पोयतिवा” मन्त्रमें राम कृष्ण आदि अवतारोंके होनेकी सूचना, तथा उनसे असुरोंके प्रतिकूल और सुरोंके अनुकूल बर्तावकी स्वाभाविकता आती है । ऐसी ऐसी अनेक बातें मन्त्रोंसे मिल सकती हैं, किन्तु अध्ययन करने वालेकी बुद्धि और ध्यान पर निर्भर है । इति हिन्दी निरुक्ते तृतीयाध्यायस्य चतुर्थः पादः समाप्तः ॥ ३, ४ ॥ निरुक्तके तृतीयाध्यायका खण्ड सूत्र— [प्र० पा०] कर्मनामानि (१) परिषद्यं (२) नहिय- भाय (३) शासद्वन्हिः (४) अभ्रातेव (५) न जामये (६) [द्वि० पा०] मनुष्य-नामानि (७) तदद्य (८) दृषाव- निभ्यः (६) अभ्रातृं (१०) त्वयावयं (११) यथा सुपर्णा (१२) [तृ० पा०] बहुनामानि (१३) तनुत्यजे (१४) कुहश्चित् (१५) चतुरश्चित् (१६) प्रियमेधवत् (१७) [च० पो०] अथ लुप्तोपमानि (१८) अर्वंति (१९) दिशो (२०) रम्भः (२१) कतरा पूर्वा (२२) द्वाविंशतिः ॥ इति निरुक्ते पूर्वषट्के तृतीयोऽध्यायः ॥३॥ (नैघण्टुकं काण्डं समाप्तम् ।) इति हिन्दी निरुक्ते तृतीयोऽध्यायः समाप्तः ॥३॥ (नैघण्टुकं काण्डं समाप्तम् ।)
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