निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ५६ ) ४ अ० २ पा० ४खं० परिमाण से बनी हुई) । वे दो कन्याएं जिस प्रकार उन अधिष्ठानों ( खड़ाऊँओं ) पर शोभित होती हैं, उसी प्रकार यामों (अश्वशालाओं) में बभ्रु (बादामी रंगकी) घोड़िएं शो- भित होती हैं [यह-] बभ्रु वर्ण वाली घोडियों की स्तुति है ॥ व्याख्या । “कनीनकेव” [ऋ०सं० ३,६,३०,७] यह मन्त्र ‘विद्रुधे’ (१८) ‘द्रुपदे’ (१९) इन दो पदों के उदाहरण में दिया है । ‘विद्रुध’ नाम विवृढ या विशेष दृढ का, और ‘द्रुपद’ ‘द्रु’ वृक्ष, उसके बने हुए पद ( पैर ) का है । इन पदों की विभक्ति के वचनमात्र में शाकपूणि और यास्क के मत का भेद है । मन्त्र में जैसे रूप दिए हुए हैं, वे व्याकरण में एकवचन और द्विव- चन में समान ही सिद्ध होते हैं । और अर्थ भी दोनों प्रकार से संगत होता है । इसी से दोनों ही मत सफल हो जाते हैं । ‘तुग्वनि’ (२०) शब्द के निगम की भूमिका— [ निरुक्तार्थ- ] ‘यह मुझे दिया’ ‘यह मुझे दिया इस प्रकार ( त्रसदस्युराजा के दान की ) गणना करके ( काण्व सोभरि ) ऋषि कहता है— ( “उतमे प्रयियोर्वयियोः ) “सुवास्त्वा अधि तुग्वनि” ( तिसृणां सप्ततीनां श्यावः प्रणेता भुवद् वसुर्दानां पतिः ” [ ऋ० सं० ६, १,३५, ७ ] ॥ अर्थात्- ( और ‘प्रयियु’ जिसपर चढकर चलते हैं, अश्व २० आदि धन ) सुवास्तू नदी के ‘तुग्वनि’ तीर्थपर ( मुझे दिया ‘वयियु’ विनाहुआ वस्त्र आदि धन मुझे दिया । तीन सप्तति ( ७० ) अर्थात् दोसौ दश (२१०) गौओंके आगे चलने वाला