भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 474

हिन्दी निरुक्त ( ५५ ) ४ अ० २ पा० ७ ख० (भा०) ये ते मदा आहननवन्तो वञ्चनवन्तः, तैः-इन्द्रं चोदय दानाय मघवम् ॥ ७ (१५) ॥ अनुवादः । मन्त्रार्थः-हे इन्द्र! ‘विद्रधे’ (१८) बहुत दृढ ‘नवे’ नवीन ‘अर्भके’ ठीक परिमाण से युक्त ‘द्रुपदे’ खड़ाऊंओंके ऊपर चढ़ी हुईं ‘कनीनका’-‘इव’ दो कन्याओंके समान ‘यामेषु’ घुड़शाल में ‘बभ्रू’ भूरे रंग वाली घोड़ियें ‘शोभेते’ सुहाती हैं ॥ निरुक्तार्थः-‘कनीनका’ दो कन्याएं । ‘कन्या’ क्यों? कम- नीय (वाञ्छनीय) होती है । [ सभी उसे चाहते हैं ] अथवा ‘कहां यह पहुंचाना चाहिये’ यह उस के अर्थ पिता चिन्ता करता है । अथवा कमन (सुन्दर वर) से आनयन की जाती है (लाई जाती है) । अथवा इच्छार्थक ‘कन्’ (स्वा०प०) धातु से है । ‘‘‘विद्रधे’ ‘नवे’ ‘द्रुपदे’ ‘अर्भके’ ये चारों पद कन्याओं के अधिष्ठान (खड़ाओं) के जनाने वाले सप्तमी के एकवचन हैं’’ यह शाकपूणि आचार्य मानतेहैं । ‘विद्धयोः’ नीचे से घोड़े के खुर के आकार में घड़ी हुईं, ‘दारुपाद्योः’ दो काष्ठकी पादुकाएं (खड़ाऊँ जोड़ी) इस प्रकार अर्थ का अनुसन्धान कर के यास्काचार्य उक्त चारों पदों को द्विवचनान्त मानते हैं । ‘दारु’ शब्द ‘दृ’ विदारणे (क्र्या० प०) धातु से है । अथवा ‘द्रू’ (क्र्या० प०) धातु से है । उसी धातु से ‘द्रु’ शब्द है । ‘नवे’ नई बनी हुईं ‘अर्भके’ अवृद्ध या बड़ी नहीं (ठीक