निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
हिन्दी निरुक्त ( ५५ ) ४ अ० २ पा० ७ ख० (भा०) ये ते मदा आहननवन्तो वञ्चनवन्तः, तैः-इन्द्रं चोदय दानाय मघवम् ॥ ७ (१५) ॥ अनुवादः । मन्त्रार्थः-हे इन्द्र! ‘विद्रधे’ (१८) बहुत दृढ ‘नवे’ नवीन ‘अर्भके’ ठीक परिमाण से युक्त ‘द्रुपदे’ खड़ाऊंओंके ऊपर चढ़ी हुईं ‘कनीनका’-‘इव’ दो कन्याओंके समान ‘यामेषु’ घुड़शाल में ‘बभ्रू’ भूरे रंग वाली घोड़ियें ‘शोभेते’ सुहाती हैं ॥ निरुक्तार्थः-‘कनीनका’ दो कन्याएं । ‘कन्या’ क्यों? कम- नीय (वाञ्छनीय) होती है । [ सभी उसे चाहते हैं ] अथवा ‘कहां यह पहुंचाना चाहिये’ यह उस के अर्थ पिता चिन्ता करता है । अथवा कमन (सुन्दर वर) से आनयन की जाती है (लाई जाती है) । अथवा इच्छार्थक ‘कन्’ (स्वा०प०) धातु से है । ‘‘‘विद्रधे’ ‘नवे’ ‘द्रुपदे’ ‘अर्भके’ ये चारों पद कन्याओं के अधिष्ठान (खड़ाओं) के जनाने वाले सप्तमी के एकवचन हैं’’ यह शाकपूणि आचार्य मानतेहैं । ‘विद्धयोः’ नीचे से घोड़े के खुर के आकार में घड़ी हुईं, ‘दारुपाद्योः’ दो काष्ठकी पादुकाएं (खड़ाऊँ जोड़ी) इस प्रकार अर्थ का अनुसन्धान कर के यास्काचार्य उक्त चारों पदों को द्विवचनान्त मानते हैं । ‘दारु’ शब्द ‘दृ’ विदारणे (क्र्या० प०) धातु से है । अथवा ‘द्रू’ (क्र्या० प०) धातु से है । उसी धातु से ‘द्रु’ शब्द है । ‘नवे’ नई बनी हुईं ‘अर्भके’ अवृद्ध या बड़ी नहीं (ठीक
हिन्दी निरुक्त ( ५६ ) ४ अ० २ पा० ४खं० परिमाण से बनी हुई) । वे दो कन्याएं जिस प्रकार उन अधिष्ठानों ( खड़ाऊँओं ) पर शोभित होती हैं, उसी प्रकार यामों (अश्वशालाओं) में बभ्रु (बादामी रंगकी) घोड़िएं शो- भित होती हैं [यह-] बभ्रु वर्ण वाली घोडियों की स्तुति है ॥ व्याख्या । “कनीनकेव” [ऋ०सं० ३,६,३०,७] यह मन्त्र ‘विद्रुधे’ (१८) ‘द्रुपदे’ (१९) इन दो पदों के उदाहरण में दिया है । ‘विद्रुध’ नाम विवृढ या विशेष दृढ का, और ‘द्रुपद’ ‘द्रु’ वृक्ष, उसके बने हुए पद ( पैर ) का है । इन पदों की विभक्ति के वचनमात्र में शाकपूणि और यास्क के मत का भेद है । मन्त्र में जैसे रूप दिए हुए हैं, वे व्याकरण में एकवचन और द्विव- चन में समान ही सिद्ध होते हैं । और अर्थ भी दोनों प्रकार से संगत होता है । इसी से दोनों ही मत सफल हो जाते हैं । ‘तुग्वनि’ (२०) शब्द के निगम की भूमिका— [ निरुक्तार्थ- ] ‘यह मुझे दिया’ ‘यह मुझे दिया इस प्रकार ( त्रसदस्युराजा के दान की ) गणना करके ( काण्व सोभरि ) ऋषि कहता है— ( “उतमे प्रयियोर्वयियोः ) “सुवास्त्वा अधि तुग्वनि” ( तिसृणां सप्ततीनां श्यावः प्रणेता भुवद् वसुर्दानां पतिः ” [ ऋ० सं० ६, १,३५, ७ ] ॥ अर्थात्- ( और ‘प्रयियु’ जिसपर चढकर चलते हैं, अश्व २० आदि धन ) सुवास्तू नदी के ‘तुग्वनि’ तीर्थपर ( मुझे दिया ‘वयियु’ विनाहुआ वस्त्र आदि धन मुझे दिया । तीन सप्तति ( ७० ) अर्थात् दोसौ दश (२१०) गौओंके आगे चलने वाला
हिन्दी निरुक्त ( ५७ ) ४ अ० २ पा० ७ ख०
'श्याव' श्याम वर्ण वृषभ (सांड) 'भुवद्-वसु' धनों को उत्पन्न
करने वाले 'दियांनां पतिः' दान योग्य धनों के स्वामी त्रसद-
स्यु ने मुझे दिया ॥
व्याख्या ।
यहां दान के सम्बन्ध से 'सुवास्तु' शब्द नदी का वाचक
होता है क्योंकि-नदी पर दान करना प्रसिद्ध है । और नदी
के सम्बन्ध से ही 'तुग्वन्' शब्द तीर्थ का वाचक होता है ।
भाष्यकार ने इस प्रकार से यह भी सूचित किया कि-निगम
(मन्त्र) के अर्थके निश्चयार्थ सूक्त का अर्थ भी देख लेना चाहिए
जिस ऋचा में सौभरि ऋषिने त्रसदस्यु के दान की बड़ाई
पहिले की है, वह ऋचा—
“ अदान्मे पौरुकुत्स्यः पञ्चाशतं त्रसदस्युर्वधूनाम् ।
मंहिष्ठो अर्य्यः सत्पतिः” [ ऋ० सं० ६, १, ३५, ६ ]
यह ऋचा कण्वके पुत्र सौभरि ऋषि की है । वह कहता
है कि-'मंहिष्ठ', बड़ा पूजनीय 'अर्य्य', ईश्वर 'पौरुकुत्स्य'
बहुत शत्रुओं की मारने वाले का पुत्र 'त्रसदस्यु' दस्युओं
(डाकुओं) को डराने वाले राजा ने 'पञ्चाशत्' पचास ( ५० )
'वधू' ब्याहने योग्य कन्याएं 'मै' मुझे 'अदात्' दी हैं ॥
इन दोनों ऋचाओं में नदी तीर्थ पर दान करने की
महिमा और कन्याओं के दान की महिमा तथा एक पुरुष को
अनेक वधू देने की महिमा आती है । ऐसे दानों को वेद में
ढूंढने वालों के लिये ये ऋचाएं पूरा सन्तोष देने वाली हैं ।
निरुक्तार्थ-'नमन्त' (२१) शब्द का निगम—
“कुविन्नं सन्ते मरुतः पुनर्नः” (ऋ०सं०५,४,२८,४)।
८
हिन्दी निरुक्त ( ५८ ) ४ अ० २ पा० ८ खं० अर्थात्-'मरुतः' मरुत् देवता 'नः' हमारे अर्थ 'पुनः' फिर 'कुचित्' बहुत 'नंसन्ते' वर्षा आदि उपकार से झुकते हैं । 'नंसन्त' (२२) आगे १२वें अध्याय में व्याख्यान करेंगे । आहनसः (२३) शब्द का निगम— “येतमदा” ०० ( ऋ० सं० ७, २, ३३, ५ ) अर्थात् हे सोम ! 'ये' जो 'ते' तेरे 'मदाः' मद 'आहनसः' बहुन्न या मोहित करने वाले 'विहायसः' और बड़े हैं, 'तेभिः' उन मदों से ' मघम् ' धन को 'दातवे' देने के अर्थ 'इन्द्रम्' इन्द्रदेव को 'चोदय' प्रेरणा कर (जिससे कि-वह उन्मत्त होकर हमें धन दे । ) ७ ( १६ ) ॥ १ ( ८ खं० ) [निरु०] “उपो अदर्शि शुन्ध्युवो न वक्षो नोधा इवाविरकृत प्रियाणि । अद्मसन्न ससतो बोधय- न्ती शश्वत्तमागात्पुनरेयुषीणाम् ॥” [ ऋ० सं० २, १, ७, ४ ] ( भा० ) उपादर्शि 'शुन्ध्युवः' । 'शुन्ध्युः' आ- दित्योभवति । शोधनात् । तस्यैव वक्षो भासा- ध्यूढः ( म् ) इदमपि इतरद् 'वक्षः' एतस्मादेव । अध्यूढं काये । शकुनिरपि शुन्ध्युरुच्यते । शोध- नादेव । उदकचरो भवति । आपोऽपि 'शुन्ध्यवः' १ “ उपो अदर्शि ” इति कक्षीवतः आर्षम् । औषसी । त्रिष्टुप् छन्दः । प्रातरनुवाकाश्विनयोः शस्यते ।
हिन्दी निरुक्त ( ५६ ) ४ अ० २ पा० ८खं०
उच्यन्ते । शोधनादेव । 'नोधा' ऋषिर्भवति । नवनं
दधाति। स यथा कामान् आविष्कुरुते, एवम् उषाः
रूपाणि आविष्कुरुते । 'अद्मसत् (२४)' । 'अद्म'
अन्नंभवति । अद्मसादिनी-इतिवा। अद्मसानिनी
इतिवा । ससतोबोधयन्ती “शश्वत्तमागात्पुनरे-
युषीणाम् ।” (स्वपतो बोधयन्ती ।) शाश्वतिक-
तमा आगात् पुनरेयुषीणाम् ।
“तेवाशीमन्त इष्मिणः” (२५) [ऋ० सं०
१,६,१३,६] ईषणिनः-इतिवा । एषणिनः-इतिवा ।
आर्षणिनः-इतिवा 'वाशी' इतिवाङ्नाम । वाश्यते
इतिसत्याः ।
“शंसावाध्वर्यो प्रति मे गृणीहीन्द्राय
वाहः (२६) कृणवाव जुष्टम् ।” [ऋ०३,३,१९,३]
अभिवहनस्तुतिम् अभिषवणप्रवादो स्तुतिं
मन्यन्ते । ऐन्द्री त्वेव शस्यते ।
'परितक्म्या' (२७) इति उपरिष्टाद्व्याख्या-
स्यामः ॥ ८ ( १६ ) ॥
इति चतुर्थाध्यायस्य द्वितीयः पादः ॥ ४, २ ॥
अनुवादः ।
मन्त्रार्थ-यह उषा 'शुन्ध्युवः' आदित्य के मण्डल में
'वक्षः' छाती के 'न' समान 'उप' उपश्लिष्ट या चिपकी हुई
हिन्दी निरुक्त ( ६० ) ४ अ० २ पा० ८ खं० 'अदर्शि' दिखाई देती है। [ क्योंकि उषा (सबेरे की लाली) के पीछे ही आदित्य-मण्डल उदय हो जाता है । ] 'नोधाः' नोधस् ऋषि के 'इव' समान ( यह उषा ) 'प्रियाणि' प्यारी वस्तुओं को 'आविः-अकृत' प्रकट करती है । 'अद्मसत्' अन्न ( रसोई ) बनाने वाली स्त्री के 'न' समान 'ससतः' सोए हुओं को 'बोधयन्ती' जगाती हुई 'पुनः-एयुषीणाम्' जा कर फिर आने वालियों में मुख्य 'शश्वत्तमा' सदा रहने वालियों में से एक यह उषा 'अगात्' आती है ॥ निरुक्तार्थ—शुन्ध्यु ( आदित्य ) के लगी हुई दिखाई देती है । 'शुन्ध्यु' आदित्य होता है। क्यों शोधन से । [अर्थात् जो कुछ भी अशुद्ध होता है, उसे अपनी किरणों से शुद्ध कर देता है । ] उसी आदित्य का वक्षस् ( छाती ) प्रकाश से पूर्ण है । यह दूसरा ' वक्षस् ' (मनुष्य की छाती) भी इसी से है । क्योंकि वह काय ( शरीर ) में अध्यूढ ( जमा हुआ ) है ॥ शकुनि (पक्षी) भी 'शुन्ध्यु' कहलाता है। क्यों ? शोधन से ही । जिससे कि- वह जलमें विचरता है। जल भी 'शुन्ध्यु' कहलाते हैं । क्यों ? शोधन से ही । ( अपवित्र वस्तु से लिपे हुए वस्त्र आदि जलसे शुद्ध हो जाते हैं।) 'नोधस्' ऋषि होता है। क्योंकि-वह नवन या स्तोत्र को धारण करता या रचता है। वह जैसे कामों ( वाञ्छाओं ) को प्रकट करता है, उसी प्रकार उषा रूपों को प्रकाश करती है । 'अद्मसत्' ( २४ ) । 'अद्म' अन्न होता है । अर्थात् अद्म- मादिनी अन्न को सुधारकर रखने वाली, या अद्मसानिनी अन्न को सानने वाली रसोई बनाने वाली स्त्री (अद्मसत् कह
हिन्दी निरुक्त ( ६१ ) ४ अ० २ पा० ८ खंड लाती है ।) सोतेहुओं को जगाती हुई । फिर आनेवालियों में से एक सदा रहने वाली ( उषा ) आती है । 'इषिभयः' (२५) का निगम— "तेवाशीमन्त इषिमिणः" (ऋ०सं०१,६,१३,६) अर्थात्—'ते' वे मरुत् 'वाशीमन्तः' वाग्मी या वाणी वाले 'इषिम्णः' गमनवाले या इच्छा वाले हैं । निरुक्तार्थ- 'ईषणिनः' गमनवाले । अथवा 'एषणिनः' इच्छा वाले । अथवा 'आर्षणिनः' अभिमुख (संमुख) भाव से सब पदार्थों के द्रष्टा या देखने वाले । 'वाशी' यह वाक् (वाणी) का नाम है । 'वाश्यते' चाही जाती है, इस कर्मवाच्य क्रिया से है । 'वाहस्' (२६) यह अनवगत पद है, पक्ष से अनेकार्थहै, उसका उदाहरण— "शंसाध्वर्यो००" ऋ० सं० ३, ३, १६, ३) अर्थात् हे अध्वर्यो ! तू आ, मुझे प्रतिगिरा (प्रतिवचन) दे, हम दोनों स्तोत्र करें । इन्द्रके लिये 'वाहस्' (२६) स्तोत्र करें (या सोमोदक-पूर्ण अधिषवण फलक (पात्र) करें ।) कोई आचार्य अभिषवण (सोमोदक पूर्ण फलक) की स्तुति मानते हैं । किन्तु इन्द्र देवता के लिये ही (यहऋचा) शस्त की जाती है । ('वाहस्' शब्द के व्याख्यान के अति- रिक्त इस मन्त्र के संबन्ध में आचार्य इतना ही और कहना चाहते हैं, यह अभिप्राय है ।) 'परितक्म्या' (२७) इस शब्द की व्याख्या निरुक्त के ११वें अध्याय में "किमिच्छन्ती सरमा प्रेद मानट्" [ऋ०सं० ८, ६, ५, १,] इस मन्त्र में करेंगे । इति चतुर्थाध्यायस्य द्वितीयः पादः॥
हिन्दी निरुक्त ( ६२ ) ४ अ० ३ पा० १ खं० चतुर्थेऽध्याये तृतीयः पादः ( १ खं० ) [निरु०-] 'सुविते' (२८) । सुइते। सूते । सुगते। प्रजायामिति वा । “सुविते माधा ।” [ य०वा०सं० ५, ५ ] इत्यपि निगमो भवति । 'दयतिः' (२९) अनेककर्मा । “नवेन पूर्वं दय- मानाः स्याम” [य०वा० २८, १६] इति उपदयाकर्मा १“य एक इद् विदयते वसु” [ऋ०सं० १, ६, ६, २] इति दानकर्मा वा विभागकर्मा वा । दुर्वर्तु र्भीमो दयते वनानि” [ऋ०सं० १, ६, ८, ५] इति दहति कर्मा । 'दुर्वर्तुः' दुर्वारः । “विदद्वसुर्दयमानो विशत्रून्” [ऋ०सं०३,२,१५,१] इति हिंसाकर्मा । “ इमे सुता इन्दवः प्रातरित्वना सजोषसा पिबतमश्विना तान् । अहं हि वामूतये वन्दनाय मां वायसो दोषा दयमानो अबूबुधत् ” ॥ 'दयमान' इति । 'नूचित्' (३०) इति निपातः पुगणनवयोः । १ “यएक इद् विदयते वसु” इति राहुगणस्य गोतमस्या- र्षम् । ऐन्द्री । उष्णिक् ।
हिन्दी निरुक्त ( ६३ ) ४ अ० ३ पा० १ खं० ‘नूच’ (३१) इति च । “अद्याचि॒न्नूचि॒त्सद॑पोनदी॒नाम्” [ ऋ० सं० ४, ७, २, ३, ] (भा०) अद्यच पुराच तदेव कर्म नदीनाम् । “नूच॒ पुरा॑च॒ सद॑नं रयी॒णाम्” [ऋ०सं०१,७,४,२] भा०-) अद्यच पुराच सदनं रयीणाम् । ‘रयिः’- इति धननाम । रातेर्दानकर्मणः ॥ १ (१७) ॥ अनुवादः । निरुक्तार्थः-‘सुविते’ (२८) इस के ‘सुइते’ ( सुन्दर गए हुए में ) सूते (जनता है) इस प्रकार दो समानरूप शब्द हैं । जिससे सुन्दर गमन और प्रजा या जनने अर्थ में होता है । “सुविते माधाः” अर्थात् हे तानूनप्त्र! तू ‘मा’ मुझे ‘सुविते’ नाम ‘सुगते’ सुगत स्थान में ( जहां गमन सुगमन हो, ) ‘धाः’ धारण कर, अथवा ‘सुविते’ नाम ‘सूते’ प्रजा या सन्तान में धारण कर जिससे कि-मैं बहु-सन्तान होऊं यह भी निगम होता है । [ निगम और भी बहुत हैं, यह ‘भी’ से सूचित होता है । ] ‘दयतिः’ (२६) शब्द अनेकार्थ है । उदाहरण— “नवेन पूर्वं दयमानाः स्याम” [य०वा०२८,१६]अर्थात् “ ‘नवेन’ नए धान्य से ‘पूर्वम्’ पुराणे धान्य की ‘दयमानाः’ रक्षा करते हुए ‘स्याम’ हम होवें ।”
हिन्दी निरुक्त ( ६४ ) ४ अ० ३ पा० १ खंड
यह उपद्या या रक्षा अर्थ में है। “यएक इद् विदयते वसु” [ ऋ० सं० १, ६, ६, २ ] अर्थात् “'यः' जो 'एकः-इत्' एक ही (इन्द्र) 'वि' नाना प्रकार से 'वसु' धन को 'दयते' देता है या बांटता है।” इस प्रकार अथवा दान अर्थ में है, अथवा विभाग (बांटने) अर्थ में है। “दुर्वर्तुर्भीमो दयते वनानि” [ऋ० सं० ४, ६, ८, ५]। अर्थात् “'दुर्वर्तुः' नहीं हटने वाला 'भीमः' सब प्राणियों को भय देने वाला अग्नि 'वनानि' वनों को 'दयते' जलाता है” इस मन्त्र में दाह अर्थ में है। “विदद्वसु र्दयमानो विशत्रून्” [ऋ० सं० ३, २, १५, २] अर्थात् “'विदद्वसुः' जिसे सब धन प्राप्त हैं, वह इन्द्र 'वि' अनेक प्रकार 'शत्रून्' शत्रुओं को 'दयमानः' मारता हुआ” इस मन्त्र में हिंसा अर्थ में है। “ इमे सुता इन्दवः दयमानो अबूबुधत् ” अर्थात् हे अश्विना ! अश्विनौ ! 'इमे' ये 'सुताः' निचोड़े हुए 'इन्दवः' सोम हैं तुम दोनों 'सजोषसा' प्रीतियुक्त 'मातरि- त्वना' प्रातःकाल ही गमन करने वाले इन्द्र के साथ 'तान्' उन सोमरसों को 'पिबतम्' पीओ। 'हि' क्योंकि 'अहम्' मैं 'क्रतवे' वाञ्छित सिद्धि के लिये 'वाम्' तुम दोनोंकी 'अन्दनाय'
वन्दना करता हूं, या वन्दना के लिये उद्यत हूं । 'दयमानः' आकाश देश से नीचे की ओर उड़ते हुए 'वायसः' काक ने 'दोषा' रात्रिके समय 'माम्' मुझे 'अबूबुधत्' नींद से उठाया । इस मन्त्र में 'दय' धातु का गति अर्थ है । [ इस मन्त्र में काक के स्पर्श की अशुभ सूचकता और उस की शान्ति के लिये अश्विनीकुमारों की स्तुति है। यह भी एक शकुन शास्त्र का मूल है ॥ 'नूचित्' (३०) यह निपात पुराण और नवीन अर्थ में है । और ' नूच ' ( ३१ ) यह भी इन्ही दोनों अर्थों में है [ उदाहरण ] “अद्याचित्”०० [ऋ० सं० ४, ७, २, ३] अर्थात् 'अद्याचित्' अब 'नूचित्' पहिले 'तत्' वही 'नदीनाम' नदियों का 'अपः' कर्म है । “नूच पुराच सदनं रयीणाम् ।” [ऋ० सं० १, ७, ४, २] 'नूच' अब 'पराच' और पहिले 'रयीणाम्' धनों का 'सदनम्' स्थान है । 'रयि' यह धन का नाम है । दानार्थक 'रा' (अदा० प०) धातु से है । १ ( १७ ) ॥ ( २ खं० ) १ (३३) (३२) [निरु०] “विद्याम तस्यतेवयमकूपारस्य दावने ।” [ऋ० सं० ४, २, १०, २] (भा०) विद्याम तस्य ते वयम्-अकुपरणस्य दानस्य । आदित्योऽपि 'अकूपारः' उच्यते । अकू- पारो भवति दूरपारः । समुद्रोऽपि ' अकूपारः ' १ “विद्याम तस्य” इति अत्रे भौमस्य द्वयमार्षम् । अच्छावाकस्य तार्तीयसवनिके आवापे नियुक्ता । ६
हिन्दी निरुक्त (६६) ४ अ० ३ पा० २ खं० उच्यते। अकूपारो भवति महापारः। कच्छपोऽपि 'अकूपारः' उच्यते। 'अकूपारः' 'न कूपम्-ऋच्छति' इति। 'कच्छपः' कच्छंपाति। कच्छेन पाति-इतिवा। 'कच्छः' खच्छः, खच्छदः। अयमपि-इतरो नदी- कच्छ एतस्मादेव। कम्-उदकं तेन छाद्यते। (३४) “शिशीते शृङ्गे रक्षसे विनिक्षे” [ऋ० सं० ३, ८, १५, ३] (भा०) निश्यति शृङ्गे रक्षसो विनिक्षणाय। 'रक्षः' रक्षितव्यम्-अस्माद् रहसि। क्षणोति-इतिवा रात्रौ नक्षते-इतिवा। (३५) “अग्निः सुतुकः सुतुकेभिरश्वैः” [ऋ०७,५,३१,७] (भा०) सुतुकनः, सुतुकनैः-इतिवा। सुप्रजाः, -- सुप्रजोभिः-इतिवा। (३६) “सुप्रायणा अस्मिन् यज्ञे विश्रयन्ताम् ।” [ य० का सं० वा सं० २८, ५]। (भा०) सुप्रगमनाः २ (१८) ॥ अनुवादः। 'दावने' (३२) (दानस्य) और 'अकूपारस्य' (३३) (अकुपरणस्य) इन दो अनवगत पदों का निम्न—
हिन्दी निरुक्त ( ६७ ) ४ अ० ३ पा० २ खं० “विद्याम”०० [ ऋ० सं० ४, २, १०, २ ] अर्थात् हम 'तस्य' उस 'ते' तेरे 'अकूपारस्य' अकुपरण ( जिस की पूर्त्ति निन्दित नहीं है ) 'दावने' दान की 'विद्याम' जानते हैं । निरुक्तार्थ-हम उस तेरे उत्तम दान को जानते हैं । आदित्य भी 'अकूपार' कहा जाता है । 'अकूपार' क्यों? दूर पारं ( जिस का पार या किनारा दूर है )। है । समुद्र भी 'अकूपार' कहा जाता है। क्यों कि अकूपार नाम महापार या विस्तृत पार वाला होता है । कछुआ भी 'अकूपार' कहा जाता है। क्यों कि वह कूप को (अल्प जल के कारण) नहीं जाता है (किन्तु बहुत फैले हुए जल को ही जाता है ।) 'कच्छप' क्यों ? 'कच्छ' नाम मुखसम्पुट को 'प' नाम रक्षा करता है । [ क्योंकि वह किसी वस्तु को भी देख कर अपने शरीर में ही मुख को छिपा लेता है । 'कच्छ' नाम मुख- संपुट अर्थ में प्रसिद्ध है । ] अथवा कच्छ नाम कटाह ( कड़ा ही ) से और अङ्गों को 'प' नाम रक्षा करता है । [ क्यों कि वह कुछ भी देख कर अपने सब अङ्गों को कटाह ( कड़ाही जैसे अङ्ग ) में प्रवेश करके कूर्म के रूप से अवस्थित हो जाता है। अथवा 'कच्छ' नाम मुखसम्पुट से 'प' नाम पीता है । ] 'कच्छ' क्यों ? जिससे कि-'खच्छ', है । 'खच्छ' क्या ! खच्छद् खच्छद् अर्थात् ख नाम आकाश को छादन करता है । [ क्योंकि वह मध्यमें स्थिर होता है । यह भी दूसरा नदी- कच्छ इसी निर्वचन से है । 'क' जल उस से छादन होता है । 'शिशीते' (३४) का निगम- “शिशीते शृङ्गे रक्षसे विनिक्षे” [ऋ०सं०३, ८, १५, ३]. अर्थात्-अग्नि देव 'रक्षसे' राक्षस के 'विनिक्षे' विनाश के अर्थ
यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का देवनागरी में पंक्ति-वार लिप्यन्तरण दिया गया है:
हिन्दी निरुक्त ( ६८ ) ४ अ० ३ पा० ३ खं० 'शृङ्गे' सींगों को ' शिशीते ' पैनाता है । [ जिस प्रकार वृष (बैल) तटोंको फोड़ता हुआ अपने सींगों को पैनाता (तीक्ष्ण करता) है, उसी प्रकार अग्नि काष्ठों को जलाता हुआ अपनीं ज्वालाओं को तीक्ष्ण करता है । ] निरुक्तार्थ—राक्षस के विनाश के लिये सींगों को तीक्ष्ण करता है । 'रक्षस्' क्यों ? इस से एकान्त देश में रक्षा करना योग्य होता है । अथवा रात्रिकाल में वह 'नक्षते' विचरता है । 'सुतुके' (३५) अनवगत शब्द का निगम— “अग्निः सुतुकः सुतुकेभिरश्वैः” [ऋ०सं०७,५३१, ७] अर्थात्—'अग्निः' हे अग्ने ! (प्रथमान्त पद सम्बोधन में बदला जाता है । क्योंकि-मन्त्रमें 'आवक्ष' मध्यम पुरुष की क्रिया है ।) तू 'सुतुकेभिः' (सुतुकनैः) सुन्दर गमनकरने वाले 'अश्वैः' घोड़ों से 'सुतुकः' (सुतुकनः) सुन्दर गमन करने वाला है । 'सुप्रायणा.' (३६) इस अनवगत पद का निगम— “सुप्रायणा अस्मिन् यज्ञे विश्रयन्ताम्” [ य० का० सं० वा० सं० २८, ५ ] । अर्थात् 'अस्मिन्' इस 'यज्ञे' यज्ञ में ('दुरः' ) द्वार 'सुप्रायणाः' ' सुप्रगमनाः ' अच्छे प्रकार से गमन करने योग्य ' विश्रयन्ताम् ' खुलें ॥ २ (१८) ॥ ( ३ खं० ) ( ३७ ) [निरु०] “देवा॑नो॒ यथा॑ सद॒मिद्वृधे अस॒न्नप्रायुवो रक्षितारो॑ दि॒वेदि॑वे” ॥ [ ऋ०सं० १, ६, १५, १ ] १—“देवानो यथा” इति गौतमस्य इयमर्षम् । अग्निष्टोमे महाव्रते तृतीयसवने वैश्वदेवे शस्त्रे शस्यते ।
(भा०) देवा नो यथा सदावर्द्धनायस्युः, 'अप्रा- युषः'(३७) अप्रमाद्यन्तः रक्षितारश्च अहनिअहनि ॥ ‘व्यवनः’ ( ३८ ) ऋषिर्भवति । च्याचयिता स्तोमानाम् । 'च्यवानम्'- इति । अप्यस्य निगमा भवन्ति । “युवं च्यवानं सनयं यथा रथं पुन र्युवानं चरथाय तक्षथुः ॥” [ ऋ० सं० ७, ८, १५, ४ ] (भा०-) युवां च्यवनं सनयं पुराणं यथा रथं पुन र्युवानं चरणाय ततक्षथुः । ‘युवा’ प्रयोति कर्माणि । ‘तक्षतिः’ करोतिकर्मा ॥ 'रजः' (३९) रजतेः । ज्योतिः रजः उच्यते । उदकं रजः उच्यते । लोकाः रजांसि उच्यन्ते । असृगहनी रजसी उच्येते । (“रजांसि चित्रा विचरन्ति तान्यव” इत्यपि निगमो भवति ) ॥ ‘हरः’ ( ४० ) हरतेः । ज्योति र्हरउच्यते । ( उदकं हर उच्यते । ) लोकाः हरांसि उच्यन्ते । ( असृगहनी हरसी ) उच्येते । “प्रत्यग्मे हंसा हरः शृणीहि” [ ] इत्यपि निगमो भवति । ) ॥ “'जुहुरे' (४१) विचितयन्तः” (ऋ०सं०४,१,११,२) ।
हिन्दी निरुक्त ( ७० ) ४ अ० ३ पा० ३ खं० (भा०-) जुह्विरे विचेतयमानाः ॥ ‘व्यन्तः’ (४२) इति एषः अनेककर्मा । “पदं देवस्य नमसा व्यन्तः” [ऋ० सं०४,४,३५,४] इति पश्यतिकर्मा । “वीहि शूर पुरोडाशम्” ( ऋ० सं०- ३, ३, ३, ३ ) इति खादतिकर्मा । “वीतं पातं पयस उस्रियायाः ।” ( ऋ० सं०२, २, २३, ४ ] । ( भा०- ) अश्नीतं पिबतं पयसः उस्रियायाः । ‘उस्रिया’-इति गोनाम । उत्साविणोऽस्यां भोगाः। ( ‘उस्रा’-इति च । ) “त्वामिन्द्र मतिभिः सुते सुनीथासो वस्यवः । (४३) गोभिः क्राणा अनूषत ।” [ ] ( भा०- ) गोभिः कुर्वाणाः अस्तोषत ॥ (४४) “आतूषिञ्च हरिमींद्रोरुपस्थे वाशीभिस्तक्षता इमन्मयीभिः ।” [ऋ०सं० ८, ५, १९, ४] (भा०-) आ- सिञ्च हरिं द्रोणुपस्थे द्रुममयस्य । ‘हरिः’ सोमः, हरितवर्णः । अयमपि इतरो हरिः एतस्मादेव । ‘वाशीभिः’ तक्षताश्मन्मयीभिः । ‘वाशीभिः’ (४४) अश्ममयीभिः इतिवा । वाग्भिः-इतिवा । (४५) “सशर्द्धदर्यो विषुणस्य जन्तोर्माशिश्नदेवा
हिन्दी निरुक्त ( ७१ ) ४ अ० ३ पा० ३खं० अपिगुर्ऋतंनः” [ऋ० सं० ५, ३, ३, ५] । (भा०) सः उत्सहतां, यो विषुणस्य जन्तोर्विषमस्य । मा शिश्नदेवाः अब्रह्मचर्याः । 'शिश्नं' श्रथतेः । “अ- पिगुर्ऋतंनः ।" (भा०) सत्यंवा यज्ञंवा ॥३[१९]॥ अनुवादः । 'अपायुवः' (३७) अनवगत पद का निगम— “देवानो यथा००” [ऋ०सं १, ६, १५, १] अर्थात् 'यथा' जिस प्रकार 'नः' हमारी 'वृधे' वृद्धिके लिये 'सदम्-इत्' सदा ही 'दिवे-दिवे' (अहनि अहनि) दिन दिन 'देवाः' देवता 'अपायुवः' (३७) (अप्रमाद्यन्तः) प्रमाद नहीं करते हुए 'रक्षि- तारः (च)' और रक्षा करते हुए 'असन' (स्युः) होवें, [ उसी प्रकार ये सोम यज्ञ या सगुण काम आवें । ] 'च्यवन' (३८) ऋषि होता है । क्यों कि-स्तोमों (मन्त्रों) का चुवाने वाला या देखने वाला है । 'च्यवान' इस नाम से भी इस (भृगु के पुत्र ऋषि) के निगम हैं— “युवं च्यवानं००” [ ऋ० सं० ७, ८, १५, ४ ] अर्थात् हे 'अश्विनौ', अश्विनी कुमारो ! 'युवम्' (युवाम्) तुम दोनों ने 'यथा' जैसे 'सनयम्' पुराने 'रथम्' रथ को [ कोई शिल्पी नवीन या चलने योग्य बनादे, ] वैसे ही 'सनयम्' बूढ़े ( चलने में असमर्थ ) 'च्यवानम्' च्यवन ऋषि को 'चरणाय' चलने के अर्थ पुनः' फिर 'युवानम्' युवा (जवान) 'तक्षथुः' (ततक्षथुः) बना दिया (कर दिया) ॥ 'युवा' क्यों?
वह कर्मों को जैसा चाहिए युवाता (सम्पादन करता है ।) 'तक्ष' (भ्वा० प०) धातु 'करोति' करना अर्थ में है । रजस् (३६) 'रञ्ज' रागे (भ्वा० प०) धातु से है । ज्योति 'रजस्' कहा जाता है । जल 'रजस्' कहा जाता है । लोक 'रजस्' कहे जाते हैं । असृक् (रक्त) और अहन् (दिन) रजस् कहे जाते हैं । (“ रजांसि चित्रा विचरन्ति तान्यव” यह भी निगम है ।) ॥ 'हरस्' (४०) हरति 'हृञ्' हरणे (भ्वा० उ०) धातु से है । ज्योति 'हरस्' कही जाती है । [ क्योंकि वह हर ली जाती है, या वह स्नेह (चिकनाई) को हर लेती है । अथवा तम (अंधेरे) को हर लेती है । ] जल 'हरस्' कहा जाता है (क्योंकि लोक उसे जीवन के अर्थ ले जाते हैं ।) लोक 'हरस्' कहलाते हैं । [ क्योंकि जिन के पुण्य क्षीण हो जाते हैं, वे प्राणी वहां से हर लिये (हटा लिये) जाते हैं ।] 'जुहुरे' (४१) (जुह्वहिरे) इस अनवगत पद का निगम— “जुहुरे विचितयन्तः” [ऋ० सं० ४, १, ११, २] अर्थात् 'जुहुरे' (जुह्विरे) अग्नि में होम करते हैं 'विचितयन्तः' (विचेतयमानाः) वेदान्त दर्शन से कर्त्ता, कर्म, और साधन रूप कारकों के यथार्थ रूप को जानते हुए ॥ 'व्यन्तः' (४२) यह (वी० अदा० प० धा०) अनेकार्थ है । [निगम-] “पदं देवस्य नमसा व्यन्तः” [ऋ० सं० ४, ४, ३५, ४] अर्थात् “'देवस्य' अग्निदेव के 'नमसा' नमस्कार या मन्त्र से 'पदम्' यथार्थ (वास्तविक)
हिन्दी निरुक्त ( ७३ ) ४ अ० ३ पा० ३ खं० रूप को 'व्यन्तः' देखते हुए।” यहां दर्शन अर्थ में है। “वीहि शूर पुरोडाशम्” [ ऋ० सं० ३,३,३,३ ] अर्थात्—हे शूर ! इन्द्र ! ‘पुरोडाशम्’ पुरोडाश को ‘वीहि’ खा। इस मन्त्र में खाना (भोजन) अर्थ में है । “वीतं पातं पयस उस्रियायाः” [ ऋ० सं २, २, २३, ४] अर्थात्-हे मित्रावरुणो ! ‘उस्रियायाः’ उस्रिया के दूधसे बनी हुई ‘पयसः’ पयस्या के भाग को ‘वीतम्’ खाओ ‘पातम्’ पीओ । इस मन्त्र में भी भोजन अर्थ है। ‘उस्रिया’ यह गौका नाम है। क्योंकि- इस में भोग उत्पन्न होते हैं । (और ‘उस्रा’ यह भी गौका नाम है ।) 'क्राणा.' (४३) (कुर्वाणाः) इस अनवगत पद का निगम— “त्वामिन्द्र ०० गोभिः क्राणा (४३) अनूषत” [ ] अर्थात्-‘हे इन्द्र ! ‘मतिभिः’ बुद्धिमान् पुरुषों से ‘सुते’ सोमके निचुड़ जाने पर ‘सुनीथासः’ सुन्दर स्तुति करने में समर्थ ‘वसूयवः’ धन की कामना वाले पुरुष ‘गोभिः’ स्तुति की वाणियों से आभिमुख्य (सम्मुखता) ‘क्राणाः’ (कुर्वाणाः) करते हुए ‘अनूषत’ (अस्तोषत) स्तुति करते हैं । 'वाशी' (४४) अनवगत पचान्तर में अनेकार्थ है, उसका निगम— “आतूषिञ्च ०० वाशीभिस्तक्षताश्मन्मयीभिः” [ ऋ० सं० ८, ५, १६, ४ ] अर्थात्-हे अध्वर्यो ! ‘हरिम्’ इस हरे रंग के सोमको ‘द्रोः’ वृक्ष (काष्ठ) के ‘उपस्थे’ अधिष- वण-फलक (पात्र) में ‘आ-सिञ्च’ डाल । ( ‘ईम्’ अनर्थक) हे होतारः ! होताओं ! तुम भी ‘अश्मन्मयीभिः’ (अश्ममयीभिः) १०
हिन्दी निरुक्त ( ७४ ) ४ अ० ३ पा० ३ खं० पत्थर की 'वाशीभिः' ग्रावों (पात्रविशेषों) से 'तक्षत' संस्कार करो (कूटो) । दूसरा अर्थ-हे उन्नेतः ! 'हरिम्' उस हरे सोमरस को इस कलश से 'द्रोः-उपस्थे' द्रोणकलशके ऊपर 'आसिञ्च' झार । और तुम भी हे होताओ ! सींचेजाते हुए इस सोम को 'अश्म- न्मयीभिः' व्यापन होती हुई 'वाशीभिः' स्तुतियों से 'तक्षत' संस्कार करो । निरुक्तार्थ—द्रुम-मय या काठ के पात्र के ऊपर हरिको भली प्रकार सींच । 'हरि' नाम सोम हरे रंग का । यह दूसरा भी 'हरि' (वानरका नाम) इसी व्याख्यान से है। [क्योंकि- वह भी हरे रंग का होता है। रामायण में कहा है— “शिरीषकुसुमप्रख्याःकेचित्पिङ्गलकप्रभाः, वानराः” अर्थात् कोई सिरस के फूलके रंग के और कोई पीले वानर थे । “तक्षताश्मन्मयीभिः” इस मन्त्र में 'वाशीभिः' पदके पत्थर के पात्रों से अथवा बाणियों (स्तुतियों) से इस प्रकार दो अर्थ होते हैं । 'विषुणा' (४५) (विषमः) इस अनवगत पद का निगम— “ स शर्द्धदर्यो विषुणस्य ००” [ऋ० सं० ५, ३, ३,५ ] अर्थात्-हे इन्द्र ! 'सः' वह 'शर्द्धत्' (हमारे यज्ञ में) आसके, जो 'अर्य्यः' जितेन्द्रियहो, और 'विषुणस्य' (विषमस्य) यज्ञ के विध्वंस करने वाले 'जन्तोः' मनुष्य के (दबाने में समर्थ हो ।) किन्तु-'शिश्नदेवाः' ब्रह्मचर्य्य से रहित पुरुष 'नः' हमारे 'ऋतम्' यज्ञ में या सत्य में 'मा' न 'अपिगुः' आवें । निरुक्तार्थ-वह उत्साह करे जो विषुणा (विषम) यज्ञ के विध्वंस करने वाले का। न शिश्नदेव या अब्रह्मचर्य से