निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 483, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ६४ ) ४ अ० ३ पा० १ खंड
यह उपद्या या रक्षा अर्थ में है। “यएक इद् विदयते वसु” [ ऋ० सं० १, ६, ६, २ ] अर्थात् “'यः' जो 'एकः-इत्' एक ही (इन्द्र) 'वि' नाना प्रकार से 'वसु' धन को 'दयते' देता है या बांटता है।” इस प्रकार अथवा दान अर्थ में है, अथवा विभाग (बांटने) अर्थ में है। “दुर्वर्तुर्भीमो दयते वनानि” [ऋ० सं० ४, ६, ८, ५]। अर्थात् “'दुर्वर्तुः' नहीं हटने वाला 'भीमः' सब प्राणियों को भय देने वाला अग्नि 'वनानि' वनों को 'दयते' जलाता है” इस मन्त्र में दाह अर्थ में है। “विदद्वसु र्दयमानो विशत्रून्” [ऋ० सं० ३, २, १५, २] अर्थात् “'विदद्वसुः' जिसे सब धन प्राप्त हैं, वह इन्द्र 'वि' अनेक प्रकार 'शत्रून्' शत्रुओं को 'दयमानः' मारता हुआ” इस मन्त्र में हिंसा अर्थ में है। “ इमे सुता इन्दवः दयमानो अबूबुधत् ” अर्थात् हे अश्विना ! अश्विनौ ! 'इमे' ये 'सुताः' निचोड़े हुए 'इन्दवः' सोम हैं तुम दोनों 'सजोषसा' प्रीतियुक्त 'मातरि- त्वना' प्रातःकाल ही गमन करने वाले इन्द्र के साथ 'तान्' उन सोमरसों को 'पिबतम्' पीओ। 'हि' क्योंकि 'अहम्' मैं 'क्रतवे' वाञ्छित सिद्धि के लिये 'वाम्' तुम दोनोंकी 'अन्दनाय'