भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 484

वन्दना करता हूं, या वन्दना के लिये उद्यत हूं । 'दयमानः' आकाश देश से नीचे की ओर उड़ते हुए 'वायसः' काक ने 'दोषा' रात्रिके समय 'माम्' मुझे 'अबूबुधत्' नींद से उठाया । इस मन्त्र में 'दय' धातु का गति अर्थ है । [ इस मन्त्र में काक के स्पर्श की अशुभ सूचकता और उस की शान्ति के लिये अश्विनीकुमारों की स्तुति है। यह भी एक शकुन शास्त्र का मूल है ॥ 'नूचित्' (३०) यह निपात पुराण और नवीन अर्थ में है । और ' नूच ' ( ३१ ) यह भी इन्ही दोनों अर्थों में है [ उदाहरण ] “अद्याचित्”०० [ऋ० सं० ४, ७, २, ३] अर्थात् 'अद्याचित्' अब 'नूचित्' पहिले 'तत्' वही 'नदीनाम' नदियों का 'अपः' कर्म है । “नूच पुराच सदनं रयीणाम् ।” [ऋ० सं० १, ७, ४, २] 'नूच' अब 'पराच' और पहिले 'रयीणाम्' धनों का 'सदनम्' स्थान है । 'रयि' यह धन का नाम है । दानार्थक 'रा' (अदा० प०) धातु से है । १ ( १७ ) ॥ ( २ खं० ) १ (३३) (३२) [निरु०] “विद्याम तस्यतेवयमकूपारस्य दावने ।” [ऋ० सं० ४, २, १०, २] (भा०) विद्याम तस्य ते वयम्-अकुपरणस्य दानस्य । आदित्योऽपि 'अकूपारः' उच्यते । अकू- पारो भवति दूरपारः । समुद्रोऽपि ' अकूपारः ' १ “विद्याम तस्य” इति अत्रे भौमस्य द्वयमार्षम् । अच्छावाकस्य तार्तीयसवनिके आवापे नियुक्ता । ६