निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ६७ ) ४ अ० ३ पा० २ खं० “विद्याम”०० [ ऋ० सं० ४, २, १०, २ ] अर्थात् हम 'तस्य' उस 'ते' तेरे 'अकूपारस्य' अकुपरण ( जिस की पूर्त्ति निन्दित नहीं है ) 'दावने' दान की 'विद्याम' जानते हैं । निरुक्तार्थ-हम उस तेरे उत्तम दान को जानते हैं । आदित्य भी 'अकूपार' कहा जाता है । 'अकूपार' क्यों? दूर पारं ( जिस का पार या किनारा दूर है )। है । समुद्र भी 'अकूपार' कहा जाता है। क्यों कि अकूपार नाम महापार या विस्तृत पार वाला होता है । कछुआ भी 'अकूपार' कहा जाता है। क्यों कि वह कूप को (अल्प जल के कारण) नहीं जाता है (किन्तु बहुत फैले हुए जल को ही जाता है ।) 'कच्छप' क्यों ? 'कच्छ' नाम मुखसम्पुट को 'प' नाम रक्षा करता है । [ क्योंकि वह किसी वस्तु को भी देख कर अपने शरीर में ही मुख को छिपा लेता है । 'कच्छ' नाम मुख- संपुट अर्थ में प्रसिद्ध है । ] अथवा कच्छ नाम कटाह ( कड़ा ही ) से और अङ्गों को 'प' नाम रक्षा करता है । [ क्यों कि वह कुछ भी देख कर अपने सब अङ्गों को कटाह ( कड़ाही जैसे अङ्ग ) में प्रवेश करके कूर्म के रूप से अवस्थित हो जाता है। अथवा 'कच्छ' नाम मुखसम्पुट से 'प' नाम पीता है । ] 'कच्छ' क्यों ? जिससे कि-'खच्छ', है । 'खच्छ' क्या ! खच्छद् खच्छद् अर्थात् ख नाम आकाश को छादन करता है । [ क्योंकि वह मध्यमें स्थिर होता है । यह भी दूसरा नदी- कच्छ इसी निर्वचन से है । 'क' जल उस से छादन होता है । 'शिशीते' (३४) का निगम- “शिशीते शृङ्गे रक्षसे विनिक्षे” [ऋ०सं०३, ८, १५, ३]. अर्थात्-अग्नि देव 'रक्षसे' राक्षस के 'विनिक्षे' विनाश के अर्थ