निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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हिन्दी निरुक्त ( ६८ ) ४ अ० ३ पा० ३ खं० 'शृङ्गे' सींगों को ' शिशीते ' पैनाता है । [ जिस प्रकार वृष (बैल) तटोंको फोड़ता हुआ अपने सींगों को पैनाता (तीक्ष्ण करता) है, उसी प्रकार अग्नि काष्ठों को जलाता हुआ अपनीं ज्वालाओं को तीक्ष्ण करता है । ] निरुक्तार्थ—राक्षस के विनाश के लिये सींगों को तीक्ष्ण करता है । 'रक्षस्' क्यों ? इस से एकान्त देश में रक्षा करना योग्य होता है । अथवा रात्रिकाल में वह 'नक्षते' विचरता है । 'सुतुके' (३५) अनवगत शब्द का निगम— “अग्निः सुतुकः सुतुकेभिरश्वैः” [ऋ०सं०७,५३१, ७] अर्थात्—'अग्निः' हे अग्ने ! (प्रथमान्त पद सम्बोधन में बदला जाता है । क्योंकि-मन्त्रमें 'आवक्ष' मध्यम पुरुष की क्रिया है ।) तू 'सुतुकेभिः' (सुतुकनैः) सुन्दर गमनकरने वाले 'अश्वैः' घोड़ों से 'सुतुकः' (सुतुकनः) सुन्दर गमन करने वाला है । 'सुप्रायणा.' (३६) इस अनवगत पद का निगम— “सुप्रायणा अस्मिन् यज्ञे विश्रयन्ताम्” [ य० का० सं० वा० सं० २८, ५ ] । अर्थात् 'अस्मिन्' इस 'यज्ञे' यज्ञ में ('दुरः' ) द्वार 'सुप्रायणाः' ' सुप्रगमनाः ' अच्छे प्रकार से गमन करने योग्य ' विश्रयन्ताम् ' खुलें ॥ २ (१८) ॥ ( ३ खं० ) ( ३७ ) [निरु०] “देवा॑नो॒ यथा॑ सद॒मिद्वृधे अस॒न्नप्रायुवो रक्षितारो॑ दि॒वेदि॑वे” ॥ [ ऋ०सं० १, ६, १५, १ ] १—“देवानो यथा” इति गौतमस्य इयमर्षम् । अग्निष्टोमे महाव्रते तृतीयसवने वैश्वदेवे शस्त्रे शस्यते ।