निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ७१ ) ४ अ० ३ पा० ३खं० अपिगुर्ऋतंनः” [ऋ० सं० ५, ३, ३, ५] । (भा०) सः उत्सहतां, यो विषुणस्य जन्तोर्विषमस्य । मा शिश्नदेवाः अब्रह्मचर्याः । 'शिश्नं' श्रथतेः । “अ- पिगुर्ऋतंनः ।" (भा०) सत्यंवा यज्ञंवा ॥३[१९]॥ अनुवादः । 'अपायुवः' (३७) अनवगत पद का निगम— “देवानो यथा००” [ऋ०सं १, ६, १५, १] अर्थात् 'यथा' जिस प्रकार 'नः' हमारी 'वृधे' वृद्धिके लिये 'सदम्-इत्' सदा ही 'दिवे-दिवे' (अहनि अहनि) दिन दिन 'देवाः' देवता 'अपायुवः' (३७) (अप्रमाद्यन्तः) प्रमाद नहीं करते हुए 'रक्षि- तारः (च)' और रक्षा करते हुए 'असन' (स्युः) होवें, [ उसी प्रकार ये सोम यज्ञ या सगुण काम आवें । ] 'च्यवन' (३८) ऋषि होता है । क्यों कि-स्तोमों (मन्त्रों) का चुवाने वाला या देखने वाला है । 'च्यवान' इस नाम से भी इस (भृगु के पुत्र ऋषि) के निगम हैं— “युवं च्यवानं००” [ ऋ० सं० ७, ८, १५, ४ ] अर्थात् हे 'अश्विनौ', अश्विनी कुमारो ! 'युवम्' (युवाम्) तुम दोनों ने 'यथा' जैसे 'सनयम्' पुराने 'रथम्' रथ को [ कोई शिल्पी नवीन या चलने योग्य बनादे, ] वैसे ही 'सनयम्' बूढ़े ( चलने में असमर्थ ) 'च्यवानम्' च्यवन ऋषि को 'चरणाय' चलने के अर्थ पुनः' फिर 'युवानम्' युवा (जवान) 'तक्षथुः' (ततक्षथुः) बना दिया (कर दिया) ॥ 'युवा' क्यों?