भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 491

वह कर्मों को जैसा चाहिए युवाता (सम्पादन करता है ।) 'तक्ष' (भ्वा० प०) धातु 'करोति' करना अर्थ में है । रजस् (३६) 'रञ्ज' रागे (भ्वा० प०) धातु से है । ज्योति 'रजस्' कहा जाता है । जल 'रजस्' कहा जाता है । लोक 'रजस्' कहे जाते हैं । असृक् (रक्त) और अहन् (दिन) रजस् कहे जाते हैं । (“ रजांसि चित्रा विचरन्ति तान्यव” यह भी निगम है ।) ॥ 'हरस्' (४०) हरति 'हृञ्' हरणे (भ्वा० उ०) धातु से है । ज्योति 'हरस्' कही जाती है । [ क्योंकि वह हर ली जाती है, या वह स्नेह (चिकनाई) को हर लेती है । अथवा तम (अंधेरे) को हर लेती है । ] जल 'हरस्' कहा जाता है (क्योंकि लोक उसे जीवन के अर्थ ले जाते हैं ।) लोक 'हरस्' कहलाते हैं । [ क्योंकि जिन के पुण्य क्षीण हो जाते हैं, वे प्राणी वहां से हर लिये (हटा लिये) जाते हैं ।] 'जुहुरे' (४१) (जुह्वहिरे) इस अनवगत पद का निगम— “जुहुरे विचितयन्तः” [ऋ० सं० ४, १, ११, २] अर्थात् 'जुहुरे' (जुह्विरे) अग्नि में होम करते हैं 'विचितयन्तः' (विचेतयमानाः) वेदान्त दर्शन से कर्त्ता, कर्म, और साधन रूप कारकों के यथार्थ रूप को जानते हुए ॥ 'व्यन्तः' (४२) यह (वी० अदा० प० धा०) अनेकार्थ है । [निगम-] “पदं देवस्य नमसा व्यन्तः” [ऋ० सं० ४, ४, ३५, ४] अर्थात् “'देवस्य' अग्निदेव के 'नमसा' नमस्कार या मन्त्र से 'पदम्' यथार्थ (वास्तविक)