भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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हिन्दी निरुक्त ( ७३ ) ४ अ० ३ पा० ३ खं० रूप को 'व्यन्तः' देखते हुए।” यहां दर्शन अर्थ में है। “वीहि शूर पुरोडाशम्” [ ऋ० सं० ३,३,३,३ ] अर्थात्—हे शूर ! इन्द्र ! ‘पुरोडाशम्’ पुरोडाश को ‘वीहि’ खा। इस मन्त्र में खाना (भोजन) अर्थ में है । “वीतं पातं पयस उस्रियायाः” [ ऋ० सं २, २, २३, ४] अर्थात्-हे मित्रावरुणो ! ‘उस्रियायाः’ उस्रिया के दूधसे बनी हुई ‘पयसः’ पयस्या के भाग को ‘वीतम्’ खाओ ‘पातम्’ पीओ । इस मन्त्र में भी भोजन अर्थ है। ‘उस्रिया’ यह गौका नाम है। क्योंकि- इस में भोग उत्पन्न होते हैं । (और ‘उस्रा’ यह भी गौका नाम है ।) 'क्राणा.' (४३) (कुर्वाणाः) इस अनवगत पद का निगम— “त्वामिन्द्र ०० गोभिः क्राणा (४३) अनूषत” [ ] अर्थात्-‘हे इन्द्र ! ‘मतिभिः’ बुद्धिमान् पुरुषों से ‘सुते’ सोमके निचुड़ जाने पर ‘सुनीथासः’ सुन्दर स्तुति करने में समर्थ ‘वसूयवः’ धन की कामना वाले पुरुष ‘गोभिः’ स्तुति की वाणियों से आभिमुख्य (सम्मुखता) ‘क्राणाः’ (कुर्वाणाः) करते हुए ‘अनूषत’ (अस्तोषत) स्तुति करते हैं । 'वाशी' (४४) अनवगत पचान्तर में अनेकार्थ है, उसका निगम— “आतूषिञ्च ०० वाशीभिस्तक्षताश्मन्मयीभिः” [ ऋ० सं० ८, ५, १६, ४ ] अर्थात्-हे अध्वर्यो ! ‘हरिम्’ इस हरे रंग के सोमको ‘द्रोः’ वृक्ष (काष्ठ) के ‘उपस्थे’ अधिष- वण-फलक (पात्र) में ‘आ-सिञ्च’ डाल । ( ‘ईम्’ अनर्थक) हे होतारः ! होताओं ! तुम भी ‘अश्मन्मयीभिः’ (अश्ममयीभिः) १०