निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ७४ ) ४ अ० ३ पा० ३ खं० पत्थर की 'वाशीभिः' ग्रावों (पात्रविशेषों) से 'तक्षत' संस्कार करो (कूटो) । दूसरा अर्थ-हे उन्नेतः ! 'हरिम्' उस हरे सोमरस को इस कलश से 'द्रोः-उपस्थे' द्रोणकलशके ऊपर 'आसिञ्च' झार । और तुम भी हे होताओ ! सींचेजाते हुए इस सोम को 'अश्म- न्मयीभिः' व्यापन होती हुई 'वाशीभिः' स्तुतियों से 'तक्षत' संस्कार करो । निरुक्तार्थ—द्रुम-मय या काठ के पात्र के ऊपर हरिको भली प्रकार सींच । 'हरि' नाम सोम हरे रंग का । यह दूसरा भी 'हरि' (वानरका नाम) इसी व्याख्यान से है। [क्योंकि- वह भी हरे रंग का होता है। रामायण में कहा है— “शिरीषकुसुमप्रख्याःकेचित्पिङ्गलकप्रभाः, वानराः” अर्थात् कोई सिरस के फूलके रंग के और कोई पीले वानर थे । “तक्षताश्मन्मयीभिः” इस मन्त्र में 'वाशीभिः' पदके पत्थर के पात्रों से अथवा बाणियों (स्तुतियों) से इस प्रकार दो अर्थ होते हैं । 'विषुणा' (४५) (विषमः) इस अनवगत पद का निगम— “ स शर्द्धदर्यो विषुणस्य ००” [ऋ० सं० ५, ३, ३,५ ] अर्थात्-हे इन्द्र ! 'सः' वह 'शर्द्धत्' (हमारे यज्ञ में) आसके, जो 'अर्य्यः' जितेन्द्रियहो, और 'विषुणस्य' (विषमस्य) यज्ञ के विध्वंस करने वाले 'जन्तोः' मनुष्य के (दबाने में समर्थ हो ।) किन्तु-'शिश्नदेवाः' ब्रह्मचर्य्य से रहित पुरुष 'नः' हमारे 'ऋतम्' यज्ञ में या सत्य में 'मा' न 'अपिगुः' आवें । निरुक्तार्थ-वह उत्साह करे जो विषुणा (विषम) यज्ञ के विध्वंस करने वाले का। न शिश्नदेव या अब्रह्मचर्य से