भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 494

हिन्दी निरुक्त ( ७५ ) ४ अ० ३ पा० ४ खं० रहित । 'शिश्न' शब्द 'श्नथ' (भ्वा० प०) धातु से है । “अपि गुर्ऋतम्” यहां 'ऋत' नाम सत्य का है, अथवा यज्ञ का है ॥ ३ (१६) ॥ (४ खं०) १ [निरु०-] “आघातागच्छानुत्तरा युगानि यत्र (४६) जामयः कृणवन्नजामि । उपबर्बृहि वृषभाय बाहु- मन्यमिच्छस्व सुभगे पतिं मत्।” [ऋ०सं०७,६,७,५] (भा०) आगमिष्यन्ति तानि उत्तराणि युगानि, यत्र जामयः करिष्यन्ति अजामिकर्माणि । 'जामि' (४६) अतिरेकनाम । बालिशस्य वा । असमान- जातीयस्य वा । उपजनः (मिः) । उपधेहि वृषभाय बाहुम्, 'अन्यम्-इच्छस्व सुभगे ! पतिं मत्'-इति व्याख्यातम् ॥ ४ (२०) ॥ अनुवादः । 'जामि' (४६) यह अनेकार्थ अर्थात् भगिनी, मूर्ख, और पुनरुक्त अर्थ में है । इस का निगम नीचे है, जिसमें यमका उसकी बहिन यमी के प्रति वचन है “आघाता गच्छा ००” [ऋ० सं० ७, ६, ७, ५] अर्थात्- ('घा' अनर्थक) 'ता' (तानि) वे 'उत्तरा' (उत्तराणि) १-“आघाता” इति यम ऋषिः । यमी देवता । त्रिष्टप्छन्दः ।