निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ७६ ) ४ अ० ३ पा० ४ खं०
पिछले 'युगानि' युग 'आ-गच्छान्' (आगमिष्यन्ति) आवेंगे। [वे भी काल अभी वर्त्तमान नहीं है।] 'यत्र' जिनमें 'जामयः' भाइयों की बहिनें 'अजामि' बहिनों के अयोग्य मैथुन आदि कर्मों को 'कृणवन्' (करिष्यन्ति) करेंगी। [क्योंकि-वैसा संकर कलियुग के अन्त में होता है, और यह कलियुग नहीं है। इस लिये अभी तक वर्णसंकर धर्म चला नहीं है। किन्तु सब प्रजा अपने सदाचार ही में हैं। इससे मैं कहता हूं— “उपबर्बृहि००” अर्थात्-तू 'वृषभाय' अन्य कुलमें उत्पन्न हुए हुए योग्य वर के लिये 'बाहुम्' भुजाको 'उपबर्बृहि' फैला [सर्वथा मैथुनधर्म के लिये प्रार्थना करने पर भी मैं तेरा पति न हूूंगा।] [इसी से कहता हूं-] “अन्यमिच्छस्व सुभगे पतिं मत्” अर्थात्-हे सुभगे ! 'मत्' मुझसे 'अन्यम्'दूसरे 'पतिम्'पतिको'इच्छस्व' इच्छा कर। इस प्रकार इस सूक्त में संवाद के अधिकार के कारण 'जामि' शब्द से भगिनी ही कही जाती है। निरुक्तार्थ-आवेंगे वे उत्तर युग, जिनमें बहिनें अजामि- कर्म जो उनके योग्य नहीं हैं, करेंगी। 'जामि' (४६) अतिरेक ( पुनरुक्त ) का नाम है। [इस अर्थ में निगम खोजना होगा।] अथवा बालिश या मूर्खका नाम है। अथवा असमानजातीय या भिन्न जातिके मनुष्य का नाम है, 'जामि' इस शब्द में 'मि' यह प्रत्यय है। [जो ही अर्थ 'जा' से होता है, वही 'जामि' से।] भुजा को वीर्य्य देने वाले के लिये धारण कर। “अन्यमिच्छस्व सुभगे पतिं मत्” यह अपने आप ही व्याख्या किया हुआ [स्पष्ट] है ॥ ४(२०) ॥