निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ६० ) ४ अ० २ पा० ८ खं० 'अदर्शि' दिखाई देती है। [ क्योंकि उषा (सबेरे की लाली) के पीछे ही आदित्य-मण्डल उदय हो जाता है । ] 'नोधाः' नोधस् ऋषि के 'इव' समान ( यह उषा ) 'प्रियाणि' प्यारी वस्तुओं को 'आविः-अकृत' प्रकट करती है । 'अद्मसत्' अन्न ( रसोई ) बनाने वाली स्त्री के 'न' समान 'ससतः' सोए हुओं को 'बोधयन्ती' जगाती हुई 'पुनः-एयुषीणाम्' जा कर फिर आने वालियों में मुख्य 'शश्वत्तमा' सदा रहने वालियों में से एक यह उषा 'अगात्' आती है ॥ निरुक्तार्थ—शुन्ध्यु ( आदित्य ) के लगी हुई दिखाई देती है । 'शुन्ध्यु' आदित्य होता है। क्यों शोधन से । [अर्थात् जो कुछ भी अशुद्ध होता है, उसे अपनी किरणों से शुद्ध कर देता है । ] उसी आदित्य का वक्षस् ( छाती ) प्रकाश से पूर्ण है । यह दूसरा ' वक्षस् ' (मनुष्य की छाती) भी इसी से है । क्योंकि वह काय ( शरीर ) में अध्यूढ ( जमा हुआ ) है ॥ शकुनि (पक्षी) भी 'शुन्ध्यु' कहलाता है। क्यों ? शोधन से ही । जिससे कि- वह जलमें विचरता है। जल भी 'शुन्ध्यु' कहलाते हैं । क्यों ? शोधन से ही । ( अपवित्र वस्तु से लिपे हुए वस्त्र आदि जलसे शुद्ध हो जाते हैं।) 'नोधस्' ऋषि होता है। क्योंकि-वह नवन या स्तोत्र को धारण करता या रचता है। वह जैसे कामों ( वाञ्छाओं ) को प्रकट करता है, उसी प्रकार उषा रूपों को प्रकाश करती है । 'अद्मसत्' ( २४ ) । 'अद्म' अन्न होता है । अर्थात् अद्म- मादिनी अन्न को सुधारकर रखने वाली, या अद्मसानिनी अन्न को सानने वाली रसोई बनाने वाली स्त्री (अद्मसत् कह