निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ६१ ) ४ अ० २ पा० ८ खंड लाती है ।) सोतेहुओं को जगाती हुई । फिर आनेवालियों में से एक सदा रहने वाली ( उषा ) आती है । 'इषिभयः' (२५) का निगम— "तेवाशीमन्त इषिमिणः" (ऋ०सं०१,६,१३,६) अर्थात्—'ते' वे मरुत् 'वाशीमन्तः' वाग्मी या वाणी वाले 'इषिम्णः' गमनवाले या इच्छा वाले हैं । निरुक्तार्थ- 'ईषणिनः' गमनवाले । अथवा 'एषणिनः' इच्छा वाले । अथवा 'आर्षणिनः' अभिमुख (संमुख) भाव से सब पदार्थों के द्रष्टा या देखने वाले । 'वाशी' यह वाक् (वाणी) का नाम है । 'वाश्यते' चाही जाती है, इस कर्मवाच्य क्रिया से है । 'वाहस्' (२६) यह अनवगत पद है, पक्ष से अनेकार्थहै, उसका उदाहरण— "शंसाध्वर्यो००" ऋ० सं० ३, ३, १६, ३) अर्थात् हे अध्वर्यो ! तू आ, मुझे प्रतिगिरा (प्रतिवचन) दे, हम दोनों स्तोत्र करें । इन्द्रके लिये 'वाहस्' (२६) स्तोत्र करें (या सोमोदक-पूर्ण अधिषवण फलक (पात्र) करें ।) कोई आचार्य अभिषवण (सोमोदक पूर्ण फलक) की स्तुति मानते हैं । किन्तु इन्द्र देवता के लिये ही (यहऋचा) शस्त की जाती है । ('वाहस्' शब्द के व्याख्यान के अति- रिक्त इस मन्त्र के संबन्ध में आचार्य इतना ही और कहना चाहते हैं, यह अभिप्राय है ।) 'परितक्म्या' (२७) इस शब्द की व्याख्या निरुक्त के ११वें अध्याय में "किमिच्छन्ती सरमा प्रेद मानट्" [ऋ०सं० ८, ६, ५, १,] इस मन्त्र में करेंगे । इति चतुर्थाध्यायस्य द्वितीयः पादः॥