निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ
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हिन्दी निरुक्त ( ५७ ) ४ अ० २ पा० ७ ख०
'श्याव' श्याम वर्ण वृषभ (सांड) 'भुवद्-वसु' धनों को उत्पन्न
करने वाले 'दियांनां पतिः' दान योग्य धनों के स्वामी त्रसद-
स्यु ने मुझे दिया ॥
व्याख्या ।
यहां दान के सम्बन्ध से 'सुवास्तु' शब्द नदी का वाचक
होता है क्योंकि-नदी पर दान करना प्रसिद्ध है । और नदी
के सम्बन्ध से ही 'तुग्वन्' शब्द तीर्थ का वाचक होता है ।
भाष्यकार ने इस प्रकार से यह भी सूचित किया कि-निगम
(मन्त्र) के अर्थके निश्चयार्थ सूक्त का अर्थ भी देख लेना चाहिए
जिस ऋचा में सौभरि ऋषिने त्रसदस्यु के दान की बड़ाई
पहिले की है, वह ऋचा—
“ अदान्मे पौरुकुत्स्यः पञ्चाशतं त्रसदस्युर्वधूनाम् ।
मंहिष्ठो अर्य्यः सत्पतिः” [ ऋ० सं० ६, १, ३५, ६ ]
यह ऋचा कण्वके पुत्र सौभरि ऋषि की है । वह कहता
है कि-'मंहिष्ठ', बड़ा पूजनीय 'अर्य्य', ईश्वर 'पौरुकुत्स्य'
बहुत शत्रुओं की मारने वाले का पुत्र 'त्रसदस्यु' दस्युओं
(डाकुओं) को डराने वाले राजा ने 'पञ्चाशत्' पचास ( ५० )
'वधू' ब्याहने योग्य कन्याएं 'मै' मुझे 'अदात्' दी हैं ॥
इन दोनों ऋचाओं में नदी तीर्थ पर दान करने की
महिमा और कन्याओं के दान की महिमा तथा एक पुरुष को
अनेक वधू देने की महिमा आती है । ऐसे दानों को वेद में
ढूंढने वालों के लिये ये ऋचाएं पूरा सन्तोष देने वाली हैं ।
निरुक्तार्थ-'नमन्त' (२१) शब्द का निगम—
“कुविन्नं सन्ते मरुतः पुनर्नः” (ऋ०सं०५,४,२८,४)।
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