भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 477, कुल 1282 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 477

हिन्दी निरुक्त ( ५८ ) ४ अ० २ पा० ८ खं० अर्थात्-'मरुतः' मरुत् देवता 'नः' हमारे अर्थ 'पुनः' फिर 'कुचित्' बहुत 'नंसन्ते' वर्षा आदि उपकार से झुकते हैं । 'नंसन्त' (२२) आगे १२वें अध्याय में व्याख्यान करेंगे । आहनसः (२३) शब्द का निगम— “येतमदा” ०० ( ऋ० सं० ७, २, ३३, ५ ) अर्थात् हे सोम ! 'ये' जो 'ते' तेरे 'मदाः' मद 'आहनसः' बहुन्न या मोहित करने वाले 'विहायसः' और बड़े हैं, 'तेभिः' उन मदों से ' मघम् ' धन को 'दातवे' देने के अर्थ 'इन्द्रम्' इन्द्रदेव को 'चोदय' प्रेरणा कर (जिससे कि-वह उन्मत्त होकर हमें धन दे । ) ७ ( १६ ) ॥ १ ( ८ खं० ) [निरु०] “उपो अदर्शि शुन्ध्युवो न वक्षो नोधा इवाविरकृत प्रियाणि । अद्मसन्न ससतो बोधय- न्ती शश्वत्तमागात्पुनरेयुषीणाम् ॥” [ ऋ० सं० २, १, ७, ४ ] ( भा० ) उपादर्शि 'शुन्ध्युवः' । 'शुन्ध्युः' आ- दित्योभवति । शोधनात् । तस्यैव वक्षो भासा- ध्यूढः ( म् ) इदमपि इतरद् 'वक्षः' एतस्मादेव । अध्यूढं काये । शकुनिरपि शुन्ध्युरुच्यते । शोध- नादेव । उदकचरो भवति । आपोऽपि 'शुन्ध्यवः' १ “ उपो अदर्शि ” इति कक्षीवतः आर्षम् । औषसी । त्रिष्टुप् छन्दः । प्रातरनुवाकाश्विनयोः शस्यते ।