निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ८४ ) ४ अ० ४ पा० ३ खं० और ‘पशुमत्’ अनेक जाति के पशुओं वाला ‘यूथम्’ समूह [हमारे हो] ॥ निरुक्तार्थ- इसी को। वस्त्रमथि या वस्त्रमाथी (वस्त्रों के छीन लेजाने वाले) के ‘समान। ‘वस्त्र’ शब्द ‘वस्’ (अदा० आ०) धातु से है। [क्योंकि-वह ढांपा जाता है।] ‘तायु’ यह स्तेन या लुटेरे का नाम है। [क्योंकि-] 'इसमें पापकर्म संस्त्यान या इकट्ठा रहता है' ऐसा नैरुक्त मानते हैं। अथवा ‘तस्’ उपक्षयार्थक (दिवा० प०) धातु से है। क्योंकि-वह अधार्मिक होने से हीन होता है। या परलोक की परवाह न करके कर्मों को करता है।] संग्रामों में मनुष्य पुकारते हैं। 'भर' यह संग्राम का नाम है। अथवा 'भृ' (भ्वा० उ०) धातु से है। अथवा 'हृ' (भ्वा० उ०) धातु से है। ‘नीचायमान’ नीचे नीचे अयमान चलने वाला। ‘नीचैः’ क्यों ? निश्चित (झुकाहुआ) होता है। बँधेहुए श्येन (बाज) के समान। ‘श्येन’ क्यों ? शंसनीय (प्रशंसनीय) चलता है। “श्रवश्चा- च्छा पशुमच्चयूथम्” कीर्त्ति और पशुओं वाला झुन्ड। अथवा धन और यूथ (झुन्ड)। ‘यूथ’ क्यों ? ‘यु’ (अदा० प०) धातु से है। एक स्थान में स्त्री, पुरुष, बाल, और वृद्ध पशुओं से संयुक्त होता है। जरते-(५२) (स्तौति) अर्थानवगत पद का निगम- “इन्धान एनं जरते (५२) स्वाधीः” [ऋ० सं० ७, ८, २८, १,] अर्थात् ‘इन्धानः’ दीपन करता हुआ ‘स्वाधीः’ सुन्दर बुद्धि बाला ‘एनम्’ इस अग्नि को ‘जरते’ स्तुति करता है।