निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ६२ ) ४ अ० ४ पा० ५ खं०
कर्मणः । हरते भागम् । भर्त्तव्योभवति-इतिवा । “तृतीयो भ्राता घृतपृष्ठो अस्य” अयम्-अग्निः, तत्र “अपश्यं” सर्वस्य पातारं वा पालयितारं वा विशपति सप्तपुत्रं” सप्तमपुत्रं, सर्पणपुत्रम्-इति वा । ‘सप्त’ सृप्ता संख्या । सप्त आदित्यरश्मयः इतिवदन्ति ॥ ५ (२६) ॥
अनुवादः ।
अस्य (६२) प्रधान और अप्रधान का एक मन्त्र उदाहरण- “अस्य वामस्य” ०-०[ऋ० सं० २, ३, १४, १] अर्थात् ‘वामस्य’ (वननीयस्य) याचना करने योग्य ‘पलितस्य’ (पाल- यितुः ) पालन करने वाले ‘होतुः’ आह्वान-योग्य ‘तस्य’ उस द्युलोक में रहने वाले ‘अस्य’ इस प्रत्यक्ष सूर्य्य का ‘भ्राता’ , भाग हरने वाला अथवा भरण करने ( जल से भरने ) योग्य ‘मध्यमः’ अन्तरिक्ष लोक में रहने वाला वायु ‘अस्ति’ , है । ‘अस्य’ इस मध्यमस्थान वायु का ‘तृतीयः’ तीसरा ‘भ्राता’ भाई ‘घृतपृष्ठ’ , घृत से संयुक्त पृथिवी स्थान वाला यह अग्नि है । ‘अत्र’ , इस तीन भागों में बटे हुए ज्योति में ‘विशपतिम्’ , विश्व के पालन करने वाले ‘सप्तपुत्रम्’ सात रश्मियों वाले सूर्य्य को ‘अपश्यम्’ प्रधानता से देखता हूं ॥ निरुक्तार्थ-इस वाम या वननीय ( प्रार्थनीय ) पलित ( पालन करने वाले ) होता ( आह्वान करने योग्य ) उस सूर्य्य का भ्राता व्यापक वायु है । ‘भ्रातृ’ हरणार्थक ‘भृ’ (भ्वा० उ०) धातु से है । क्यों ? भाग को हरण करता है । अथवा भर्त्तव्य