निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ६६ ) ४ अ० ४ पा० ६ खं० धातु से है। अथवा 'क्रम्' (भ्वा० प०) धातु से है । एक 'अश्व' आदित्य सप्तनामा विचरता है। 'सप्तनामा' क्या ? सात रश्मिएं इस के लिये रसों को संमुख भाव से संनामन या प्राप्त करती हैं। अथवा सात ऋषि इस की स्तुति करते हैं। यह भी दूसरा 'नाम' (मनुष्य नाम) इसी अभि-संनामन (झुकने से है। (क्योंकि- वह भी अपने अर्थ को या क्रिया पद के प्रति गौण भाव को प्रकट करने के लिए संमुख झुकता है।) पिछली आधी ऋचा 'संवत्सर' को प्राधान्य से कहती है। तीन नाभियों वालां चक्र, तीन ऋतुओं वाला संवत्सर है। (तीन ऋतु) ग्रीष्म, वर्षा, हेमन्त ये हैं। 'संवत्सर' क्या इस में सब भूत या प्राणी संवास (निवास) करते हैं। 'ग्रीष्म' इस में रस ग्रसे जाते हैं। 'वर्षा' इनमें पर्जन्य (मेघ) बरसता है। 'हेमन्त' हिम (पाला) वाला है। और 'हिम' अथवा 'हन्' (अदा०प०) धातु से है। अथवा 'हि' (स्वा० प०) धातु से है। 'अजर' जिसमें जरण (बुढापा धर्म नहो। 'अनर्व' दूसरे में प्रत्यृत या आश्रित नहो । जिसमें ये भूत भले प्रकार स्थित रहते हैं। - उस संवत्सरको सब अंशों से स्तुति करता है। “पञ्चारे चक्रे परिवर्तमाने” [ऋ० सं० २, ३, १६, ३-१, २२, ८, १३] ॥ अर्थात्-“ 'परिवर्त्तमाने' जगत् को लेकर घूमते हुए 'पञ्चारे' पांच अरों वाले 'चक्रे' काल चक्र में”-इस मन्त्र में पांच ऋतुवाला संवत्सर वर्णन किया है। “संवत्सर के पांच ऋतु होते हैं ।” यह ब्राह्मण है। इस में हेमन्त और शिशिर ऋतु का समास या एकीभाव कर दिया गया है। “पञ्चर आहु रर्पितम् ” [ऋ० सं० २, ३, १६, १]