भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 516

हिन्दी निरुक्त ( ९७ ) ४ अ० ४ पा० ६ खं० अर्थात् “ ‘षलरे’ (षडरे) छः अरों वाले संवत्सरचक्र में आदित्य को ‘अर्पितम् ’ आश्रित ‘आहुः’ कोई ब्राह्मण ग्रन्थ कहते हैं” इस में संवत्सर में छः ऋतु कहे हैं । ‘अर’ क्यों ? नाभि या पहिए के मध्य काष्ठ में प्रत्यूत (आश्रित) हैं । और ‘षष्’ ‘सह’ (भ्वा० आ० ) धातुसे है । “द्वादशारं नहि तज्जराय” [ऋ०सं० २, ३, १६, १] अर्थात् ‘द्वादशारम्’ बारह अरों वाला ‘तत्’ वह संवत्सर चक्र ‘जराय’ जीर्ण ‘न’ नहीं होता । “द्वादश प्रधयश्चक्रमेकम्” [ऋ० सं० २, ३, २३, २] अर्थात्–‘द्वादश’ बारह ‘प्रधयः’ प्रधि (गण्डपुच्छ) या मिलकर चक्रमें लगे हुए काष्ठ ‘एकम्’ एक ‘चक्रम्’ चक्र होता है । ये दोनों ऋचाओंके पाद् संवत्सर के बारह मासोंका वर्णन करते हैं । ‘मासाः’ मास क्यों? कालका मान करते हैं । ‘प्रधि’ क्यों? प्रहित या मिलकर रहता है । “तस्मिन् साकम्” ०—० [ऋ० सं० २, ३, २३, २] अर्थात् “ ‘तस्मिन्’ उस संवत्सर रूप चक्रमें ‘साकम्’ मिलकर (रात्रि और दिन ) ‘ त्रिशता ’ ( त्रीणि शतानि ) तीन सौ (३००) ‘न’ और ‘षष्टिः’ साठ (६०) अहोरात्र (दिन) ‘शङ्कवः’ कीले ‘न’ जैसे ‘अर्पिताः’ ठुके हुए हैं । ‘ लाचलासः’ (चलानि अचलानि च ) जो निरन्तर चलने वाले होनेसे चल और अपने स्वरूप को न छोड़ने वाले होनेसे अचल हैं”। यह ऋचा और- “षष्टिश्च” ०—० [ब्रा०] अर्थात्–“साठ और तीन सौ संवत्सर के अहोरात्र ( रात दिन ) हैं । ” यह ब्राह्मण रात्रि ‘और दिनको एक करके संवत्सरके दिनोंको वर्णन करता है । १३