भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 514, कुल 1282 में से

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हिन्दी निरुक्त ( ६५ ) ४ अ० ४ पा० ६ ख० “सप्तशतानि विंशतिश्च तस्थुः” (ऋ०सं० २, ३, १६, १) “सप्त च वै शतानि विंशतिश्च संवत्सरस्याहोरात्राः” इति च ब्राह्मणं विभागेन विभागेन ॥६ (२७) ॥ इति चतुर्थाध्यायस्य चतुर्थः पादः, चतुर्थोऽध्यायश्च समाप्तः । अनुवादः । जिस प्रकार यह आदित्य सात या सर्पण (गमन) स्वभाव रश्मियों से युक्त होता है, वैसा ही इस ऋचा मे वर्णन है ।— मन्त्रार्थः-‘सप्त’ सात (७) या सर्पण (गमन) करने वाले रश्मि ‘एकचक्रम्’ अकेले आकाश में चलने वाले एवम् अपने प्रकाश से अन्य ज्योतियोंको ग्रास करते हुए ‘रथम्’ रंहण या निरन्तर चलने वाले सूर्य को ‘युञ्जन्ति’ आपे से जोड़ते हैं। ‘एकः’ एक (अकेला) ‘सप्तनामा सप्तस्तुति, सप्तपुत्र, सप्ताश्व इत्यादि सप्त (७) संख्या वाली स्तुतियों वाला ‘अश्वः’ व्यापक (सूर्य) ‘वहति’ चलता है । [संवत्सरवर्णन-] ‘त्रिनाभि’ तीन ऋतु (ग्रीष्म-वर्षा-हेमन्त) रूप नाभियों वाला ‘चक्रम्’ चलन स्वभाव ‘अजरम्’ जरा (बुढापा) रहित ‘अनर्वम्’ दूसरे में नहीं आश्रित [ ऐसा संवत्सर काल ] है । ‘अत्र’ जिसमें ‘इमा’ (इमानि) ये ‘विश्वा’ (विश्वानि) सब ‘भुवना’ (भुवनानि) लोक ‘अधि-तस्थुः’ आश्रित या अधिष्ठित हैं ॥ निरुक्तार्थ-सात एक चक्र रथ को जोड़ते हैं । ‘एकचक्र’ क्या ? एक चारी या अकेला चलने वाला । ‘चक्र’ गत्यर्थक ‘चक’ (स्वा० प ) धातु से है । अथवा चर (स्वा० प०)

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