निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( १५२ ) ५ अ० २ पा० ५ खं० स्तुति करता हूं । 'तवस' यह महत् ( बड़े ) का नाम है । क्यों कि वह उदित ( प्रकाशित ) होता है । इस रजस् (अन्तरिक्ष) लोक के पराके या पराक्रान्त ( दूर से बहुत दूर के ) स्थान में निवास करते हुए को ॥ १ ॥ 'आघृणि' (३६) क्या ? आगतहृणि । वह क्या ? जिस में 'हृणि' प्रकाश या क्रोध आया हुआ हो । 'आघृणे' (हे आगतहृणे) हे प्रकाश युक्त ! या क्रोध युक्त ( आवाम् )हम दोनों ' संसचावहै ' ( संसेवावहै ) आपस में सेवाकरें ॥२॥ 'पृथुज्रयाः' (४०) क्या ? पृथुजव । वह क्या ? बड़े वेग वाला । 'पृथुज्रयाः' बड़े वेग वाले ने 'दस्योः' शत्रु या मेघ के ' आयुः ' आयु को ' अमिनात् ' ( प्रामापयत् )। मिन लिया (मांप लिया ) या नष्ट किया ॥ ३ ॥ ४ ॥ ( ६ ) ॥ (खं० ५) (निघ०) अथर्युम् ॥४१॥ (निरू०) “अग्निंनरो दीधितिभिरण्योर्हस्तच्युती जनयन्त प्रशस्तम् । दूरेदृशं गृहपतिमथर्युम् ॥” ( ऋ० सं० ५, १, २३, १ ) दीधितयः अंगुलयोभवन्ति । धीयन्ते कर्मसु । अरणी प्रत्युतः एने । अग्निः समरणात्, जायते । इतिवा । हस्तच्युती हस्तप्रच्युत्या । जनयन्त प्रशस्तं दूरे दर्शनं गृहपति मतनवन्तम् ॥ ५ ॥