निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( १५३ ) ५ अ० २ पा० ६ खं० ‘अथर्युर्’ (७१) क्या ? अतनवान् । वह क्या ? निरन्तर गमन वाला । अर्थः—‘नराः’ (मनुष्याः) मनुष्यों ने ‘दीधितिभिः’ अङ्गुलि- यों से (योक्त्रम् उत्तरारणिं च परिगृह्य) योक्त्र (रस्सी) और ऊपर की अरणि को पकड़ कर ‘हस्तच्युती’ हाथों से बिलोते हुए ‘अरण्योः’ अरणियों से ‘प्रशस्तम्’ श्रेष्ठ ‘दूरेदृशम्’ दुर्लभ दर्शन ‘गृहपतिम्’ गार्हपत्य नाम ‘अथर्युम्’ गमनवान् ‘अग्निम्’ अग्नि को ‘जनयन्त’ उत्पन्न किया । इस प्रकार ‘अथर्यु’ शब्द ‘अत’ गत्यर्थक (भ्वा० प०) धातु से है। क्योंकि-इस से इसकी शब्द समाधि है और अग्नि का अधिकार है। ‘दीधिति’ अङ्गुलिएँ होती हैं। क्योंकि-ये कर्मों में धारण की जाती हैं। ‘अरणी’ क्यों ? इनके प्रति अग्नि अरण (गमन) करता है। अथवा इनके ‘समरण’ (समागम) से अग्नि उत्पन्न होता है। ‘हस्तच्युती’ अर्थात् हाथों के चला- ने से। प्रशस्त (श्रेष्ठ) को उत्पन्न किया। दूर में दिखाई देने वाले गृहपति गृह के स्वामी अतनवान् (गमनवान्) को ॥५॥ (खंड ६) [निघ०-] काणुका ॥ ४२ ॥ (निरु०-) “एकया प्रतिधा पिबत्साकं सरांसि त्रिंशतम् इन्द्रः सोमस्य काणुका ।” (ऋ०सं० ६, ५, २९, ४) एकेन प्रतिधानेन अपिबत् साकं सह-इत्यर्थः । इन्द्रः सोमस्य काणुका, कान्तकानि इति वा । क्रान्तकानि इति वा । कृतकानि इतिवा ॥ इन्द्रः सोमस्य कान्त इतिवा । कणे घातइतिवा २०