निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसे ।) 'दैव्येन' देवताओं की निजकी वस्तु 'ब्रह्मणा' ऋग्यजुः, साम-रूप वेदसे स्तुति करते हुए 'विश्वे-देवाः' सब देवताओं ने (यह वीर्य पृथ्वी में न गिरे इस लिये) 'त्वा' तुझे (उस वीर्य के साथ) 'पुष्करे' (घड़े के ऊपर) जल या अन्तरिक्ष में 'अददन्त' धारणकिया । 'द्रप्स' वीर्य क्यों ? 'द्रप्स' कहलाता है । 'द्रप्स' क्या ! 'रेतस्' संज्ञक रस पुरुष के सब अङ्गोंसे संभृत या इकट्ठा किया हुआ होता है। अथवा 'क्षानीय' या स्त्रीयोनिका भक्ष- णीय है। इस प्रकार 'द्रप्स' शब्द भरणार्थक भृञ् (स्वा०उ०) धातु से या भक्षणार्थक 'प्सा' (अदा० प०) धातु से है। 'पुष्कर' अन्तरिक्ष होता है। क्यों कि-वह भूतों (प्राणि- ओं) को अवकाश दान से पोषण करता है। अथवा उदकं (जल) पुष्कर होता है। क्योंकि-उससे पूजा की जाती है, इस से 'पूजाकर' होने से 'पुष्कर' है। अथवा स्वयम् (आप ही) पूजनीय होने से पुष्कर है। यह पुष्कर (कमल) भी इसी से है। क्यों ? पुष्कर कहलाता है, वह भी पूजाकर (पूजा का साधन) या स्वयम् सुन्दर होने से पूजनीय है। अथवा 'वपु- ष्कर' होने से पुष्कर है। क्यों कि-व्यवहार में लाने पर भी वपुष् (शरीर) वान् हो रहता है। 'पुष्प' शब्द 'पुष्प' फूलने अर्थ में (दि० प०) धातु से है। क्योंकि-वह फूलता है। 'वयुन' (४८) शब्द अनैकार्थ और अनवगत है। 'वी' (अदा० प०) धातु से है। 'वेन' यह न्याय्य है। कान्ति अथवा प्रज्ञा (बुद्धि) अर्थ है ॥ २ (१४) ॥