भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 584

हिन्दी निरुक्त ( १६७ ) ५ अ० ३ पा० २ खं० व्याख्या । “उतासि” ऋचा में वसिष्ठ के जन्म के साथ ‘उत’ (भी) पद लगाया है, जिससे वसिष्ठ के नीचे वाली ऋचा में वर्णन किये हुए और दो जन्मों की सूचना होती है । “विद्युतो॒ ज्योतिः॒ परिसं॒जिहा॑नं मित्रा॑वरुणा॒ यदप॑श्यतां त्वा । तत्ते॒ जन्मोंतै॒कं व॑सिष्ठाग॒स्त्यो॒ यत् त्वा॒ विश॑ आजभा॒र (ऋ० सं० ५, ३, २३, ५ ) अर्थात् हे ‘वसिष्ठ!’ ‘यत्’ जो ‘मित्रावरुणा’ (मित्रावरुणौ) मित्रावरुण देवताओं ने ‘विद्युतः’ विशेष रूप से देदीप्यमान ( चमकीली ) उर्वशी से ‘परि-संजिहानम्’ चारों ओर फैलती या उत्पन्न होती हुई ‘ज्योतिः’ ज्योति को (ज्योति के रूप से) ‘त्वा’ तुझे ‘अपश्यताम्’ देखा, ‘तत्’ वह ‘ते’ तेरा ‘एकम्’ एक ‘जन्म’ जन्म है । ‘उत’ और ‘अगस्त्यः’ अगस्त्य ‘यत्’ जो ‘त्वा’ तुझे ‘विशः’ ( मनुष्यान् ) मनुष्यों के प्रति ‘आजभार’ ( आहृतवान् ) लाया, यह तेरा दूसरा जन्म है ॥ इस प्रकार “उतासि” और “विद्युतः” इन दोनों मन्त्रों में वसिष्ठ जी के तीन जन्म बताए गए हैं । पहिला जन्म–उर्वशी से निकली हुई ज्योति मित्रावरुण देवताओं को दिखाई दी । दूसरा जन्म–अगस्त्य के द्वारा मनुष्य जाति में है, इसमें यह नहीं प्रतीत होता कि–यह मैथुनजन्म है या अमेथुन ? और तीसरा जन्म–उर्वशी के दर्शन से मित्रावरुण देवताओं का वीर्य गिरता हुआ सब देवताओं ने देखा और उसे मन्त्रों के द्वारा स्तुति करके जल या अन्तरिक्ष में रखा । यहां जो तीसरा जन्म है, उस से मन्त्र के आधिभौतिक