भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 585, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 585

अर्थ के पक्ष में एक ऐसे विज्ञान की सूचना भी मिलती है, जिसमें गर्भाशय से अन्यत्र भी वीर्य रक्षित हो कर शरीर को उत्पन्न कर सकता है, अस्तु, अमेथुन सृष्टि पर अविश्वास करने वाले वैदिक इस पर ध्यान देवें । पुराणों में भी वसिष्ठ जी की उत्पत्ति उर्वशी से कही गई है, वह भी प्रपृच्छ है । मन्त्रों का विषय अनेक प्रकार का होता है-यहाँ पर “उतासि” मन्त्र का वसिष्ठ ही ऋषि (वक्ता) है, और उसी के लिये 'असि' यह मध्यम पुरुष या 'युष्मद्' (तू) शब्द है, यह परस्पर विरुद्ध है, कि-वही वक्ता और वही श्रोता ? किन्तु मन्त्र नित्य हैं, इन में यह दोष नहीं है, वास्तव में कोई श्रोता और वक्ता हो तो यह दोष आसकता है । किसी बात को किसी तरह भी कहने में वेद स्वतन्त्र है अथवा स्वयम् पुरुष भी अपने आपे को कभी कुछ कहने लगता है, उसी प्रकार यह मन्त्र भी है ॥ २ (१४) ॥ (खं० ३) (निघ०-) वाजपस्त्यम्॥४६॥ वाजगन्ध्यम् ॥५०॥ गध्यम् ॥ ५१ ॥ गधिता ॥ ५२ ॥ कौरयाणाः ॥ ५३ ॥ तौरयाणाः ॥ ५४ ॥ अह्रयाणाः ॥ ५५ ॥ हरयाणाः ॥ ५६ ॥ आरितः ॥ ५७ ॥ ब्रन्दी ॥ ५८ ॥ (निरु०-) “स इत्तमोऽवयुनं ततन्वत्सूर्येण वयुन- वच्चकार । (ऋ० सं० ४, ६, ११, ३)