निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त (२०६) ५ अ० ४ पा० ६ खं० (भरते हैं), 'इव' (यथा) जैसे 'सूर्म्यम्' (सूर्म्मि = कल्याणीर्म्मि स्रोतः) अच्छी लहरों वाला ग्राम का जल सुषिरराम्' (सुषि- रम्-अनुक्षरति) उसके बाहरके प्रदेश (गोरखा) में सब ओर व्यापन करता है ॥ यह भी निगम होता है। इस प्रकार यहां पर सिन्धुओं के अनुक्षरण (बहने) के सम्बन्ध से 'काकुद्' तालु है, यह सिद्ध होता है। इस मन्त्र के पूरे पढ़ने का प्रयोजन मन्त्र के अर्थ की गम्भीरता है। क्योंकि-और ऋचाएं जो इस प्रकरण में पूरी पढ़ी गई हैं, उन में समाम्नाय के शब्दों के अतिरिक्त भी अनवगत संस्कार पद हैं, उनकी व्याख्या दिखाने के लिये पूरी पढ़ी गई हैं, किन्तु इस ऋचा में कोई अनवगत पद भी नहीं है, इस लिये अर्थगम्भीरता ही इस के पूरे पढ़ने का कारण है। अथवा 'काकुद्' शब्द का ही अर्थ प्रयत्न से ढूंढा जा सकता है, इस लिये यह पूरी पढ़ी गई है ॥ 'सिन्धु' क्यों ? स्रवण या बहने से या झरने से ॥ 'बीरिट' (७७) यह अनवगत और पद्म से अनेकार्थ है। 'बीरिट' क्यों ? यह 'भीततन' या इसमें भी (भय) तनन (फैला हुआ) है। क्यों कि-यह (आकाश) बिना किसी आधार के ऊपर टिका हुआ है, इसी से इससे सब डरत है। बीरिट को तैटीकि आचार्य अन्तरिक्ष इस रीति से कहता है पहिला भाग (बी) 'वी' (भ्वा० प०) धातु का और दूसरा भाग (ईरिट) 'ईर्' (भ्वा०प०) धातु का है, अर्थात् 'वयांसि पक्षी इसमें 'ईरन्ति' उड़ते हैं। 'वि'- ईर्' को मिलकर बीरिट हुआ। अथवा 'भांसि' नक्षत्र इसमें 'ईरन्ति' फिरते हैं, इससे