निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ
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हिन्दी निरुक्त ( २३० ) ६ अध्याय
| संख्या | शब्द | अर्थ ( तत्व ) अवगम | निगम । |
|---|---|---|---|
| ८५ | कुलीकिशः | कुलाविशलयः ( मेघः ) | महति तनूशूने मघवा कवा सखः ।" "न्याविध्यत्कुलीकिशस्य दृहा" |
| ८६ | कियेधाः | कियद्धा धृतित्वा । क्रममाणावा धृतित्वा । ( मेघः ) | "अस्माद्दु ०० वृत्राय वज्रमीशानः कियेधाः" |
| ८७ | भृमिः | भ्राम्यतेः । ( अग्निः ) | "भृमिरस्युच्छिन्नप्रत्येनाम्" |
| ८८ | विषिपतः | विप्ताप्तः । ( सर्वतो यः प्राप्तः ) | "पारं नो अस्य विषिपतस्य पर्षण्" |
| ८९ | तुरीपम् | तूर्णपि । ( उदकम् ) | "तन्नस्तुरोपमद्भुतम्" |
| ९० | रास्पिनः | रास्पी रपतेर्वा । रसतेर्वा । | "रास्पिनस्यायोः" |
| ९१ | ऋञ्जतिः | प्रसाधनकर्मा । | "ऋञ्जतेऋज्रां व्युष्टिषु" |
| ९२ | ऋञ्जनीती | (ऋजुनयनोवा । ऋजुप्रसजो वा) (वरुणाः) | "ऋञ्जनीती नो वरुणः |
| 'ऋजुः' इत्यपि अस्य (ऋञ्जतेः) भवति | |||
| ९३ | प्रतङ्कम् | प्राप्तवत् । | "हरी इन्द्र प्रतङ्कम् अभिश्वर" |
| ९४ | हिनोत | प्रहिणुत | "हिनोता नो अध्वरं देवयज्या हिनोत ब्रह्मणस्पतये धमानाम्" |
| ९५ | चोष्कूयमाणः | दद्दत्-इत्यर्थः । | "चोष्कूयमाण इन्द्र भूरिवामम्" |