भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 648

इतरः शुनिः एतस्मादेव । निषिक्तं पापकम्- अ स्मात्-इति नैरुक्ताः ॥ १ ॥ ‘आशुशुक्षणिः’ (१) यह अनवगत है।- “त्वमग्ने” यह ऋचा गृत्समद ऋषि की है । जगती छन्द और अग्नि देवता है । प्रातरनुवाक और आश्विन शस्त्र में विनियोग है । हे भगवन् ! अग्ने ! अग्निदेव ! ‘त्वम्’ तू ‘द्युभिः’ (अहो- भिः) पौर्णमासी आदि दिनोंसे ‘जायसे’ इन मनुष्यों के द्वारा मथा जाता हुआ उत्पन्न होता है । क्योंकि- “पौर्णमास्या- म् अमावस्यायांवा आदधीत” ‘पूर्णिमा अथवा अमावस्या को अग्नि का आधान करे’ यह विधि है । और ‘त्वम्’ तू “आशुशुक्षणिः” आशुशुक्षणि है । सो क्या ? ‘आशु’ शीघ्र ‘शुचा’ दीप्ति या प्रकाश से अंधेरे को ‘क्षणोति’ नाश करने वाला । अर्थात्-इस मतमें ‘आशुशुक्षणि’ इन पांच अक्षरों में पहिले के दो अक्षर “आशु” यह शीघ्र का नाम है “शु” इस तीसरे अक्षर को उलांघ कर “क्षणि” ये पिछले अक्षर हिंसाार्थक ‘क्षण’ (तन० उ०) धातुके हैं । अथवा भजनार्थक ‘सन’ (तना० उ०) धातु के हैं । और बीच का “शु” ( शुक् ) यह अक्षर प्रकाश अर्थ वाले ‘शुच’ (भ्वा० प०) धातु का है । इस प्रकार ‘आशुशुक्षणि’ अग्नि है । अथवा ‘आशुशुक्षणिः’ यह प्रथमा पञ्चमी ( आशुशुक्षयोः ) के अर्थ में है । क्योंकि-ऐसा होने से वाक्य का संयोग या यो- जना हो जाती है । इस पक्ष में ‘आशुशुक्षणि’ यजमान है । अर्थात् हे अग्निदेव तू ‘आ’ अभिमुखता (संमुखता) से ‘शुशुक्षणि’ ३०