निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( २१४ ) ६ अ० १ पा० २ खं० दीपन (जलाने) की इच्छा वाले यजमान से (अरणि आदि के द्वारा) 'जायसे' उत्पन्न होता है। पहिले 'आ' यह आकार उपसर्ग है, और चिकीर्षित या सन्नन्त से उत्पन्न हुआ उत्तर भाग (शुश्रूक्षणि) है, इस प्रकार 'आशुशुक्षणि' शब्द सिद्ध होता है। क्या इतना ही? नहीं, हे अग्निदेव ! 'त्वम्' तू 'अद्भ्यः' (जायसे) बिजली के रूप में जलसे उत्पन्न होता है। 'त्वम्' तू 'अश्मनः' परस्पर की रगड़ से 'परि' सब ओर से पत्थर से जन्मता है। 'त्वम्' तू 'वनेवनेभ्यः' काष्ठ से, 'त्वम्' तू 'ओषधीभ्यः' (शरादिभ्यः) शर आदि ओषधियों से हे 'नृ- णां-नृपते!' नरोंके नरपति ! (जायसे) उत्पन्न होता है। और 'शुचिः' तू 'शुचि' प्रकाशमान है ॥ 'शुचि' शब्द ज्वलन (जलने) अर्थ वाले 'शुच्' (स्वा० प०) धातु से है। यह भी दूसरा शुचि (पवित्र) लौकिक शब्द इसी से होता है, यह वैयाकरण मानते हैं, किन्तु नैरुक्त आचार्य- ' 'निषिक्तम्' निकला हुआ है 'पापकम्' पाप 'अस्मात्' इससे' इस प्रकार "निर् (उपसर्ग) 'सिच्' (तु० प०) धातु से मानते हैं ॥ १ ॥ ( खं० २ ) [निघ०-] आशाभ्यः ॥२॥ काशिः ॥३॥ कुणारुम् ॥४॥ (निरु०-) "इन्द्र आशाभ्यस्परि सर्वाभ्यो अभयं करत।" (ऋ० सं० २, ८, ९, २) 'आशा' दिशो भवन्ति । आसदनात् ।