निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( २३६ ) ६ अ० १ पा० २ खं० 'आशा' उपदिशा (कोण) होती हैं। क्यों ? अभ्य- शन या आपस में एक दूसरी को व्यापन करने से ॥ 'काशि' (३) मुष्टि (मुट्ठी) होती है। क्यों ? प्रका- शन से। अर्थात् वह प्रकाश की जाती है; 'मुष्टि' क्यों ? अथवा मोचन से । [ क्योंकि वह मोचन की जाती या खोली जाती है । ] अथवा मोषणसे । [क्योंकि मोषण या चोरी की जाती है ।] अथवा मोहन से । [क्योंकि उसके बँधजाने से दूसरा मोहित हो जाता है । ] हे इन्द्र ! 'इमे-चित्' इन 'अपारे' दूर पार वालों 'रोदसी' (रोधसी = द्यावापृथिव्यौ) द्यु (लोक) और पृथिवी लोकों को भी तू 'संगृम्भा' (संगृह्णासि) संग्रह करलेता या पकड़लेता है। हे 'मघवन्' ! इन्द्र 'ते' तेरी 'इत्' ही' काशिः मुट्ठी आश्चर्य है ॥ 'रोदसी' क्यों ? विरोधनसे । क्योंकि-ये द्युलोक और पृथिवी लोक सब जगत् को अपने में रोधन करलेते (रोकलेते हैं ।] 'रोधस्' कूल (जलका कनारा) भी कहलाता है। क्यों कि वह स्रोत (प्रवाह) को रोकता है । 'कूल' शब्द उलटे हुए 'रुज' (तु०) धातु से है। 'लोष्ट' शब्द इसी धातु से बिना उलटे हो जाता है। 'अपारे क्या ? दूर पारे जिनका पार दूर हो । हे मघवन् जिससे कि-तू द्यावा पृथिवी को पकड़ लेता है, इस से तेरी मुष्टि (मुट्ठी) महान् (बड़ी) है ॥ 'कुशारुम्' (४) यह अनवगत है । मेघका नाम है। हे 'इन्द्र' ! 'कुशारुम्' (परिक्वाणनम्) शब्द करने वाले मेघ को 'अहस्तम्' बिना हाथ (कृत्वा) करके 'सपिणक्' सम्पिनिष्ट चूर्ण करदे ॥