भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 652, कुल 1282 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 652

हिन्दी निरुक्त ( २३७ ) ६ अ० १ पा० ३ खं० [ इस प्रकार यहां वध के अधिकार से 'कुयारु' क्रूरान शील का नाम हो सकता है ॥ २ ( १ ) ॥ ( खं० ३ ) निघ०-अलातृणः ॥ ५ ॥ निरु०-“अलातृणो बल इन्द्र व्रजोगोः पुराहन्तो र्भयमानो व्य़ार । सुगान्पथो अकृणोन्निरजेगाः प्रावन्वाणीः पुरुहूतं धमन्तीः ॥” ( ऋ० सं० ३, २, २, ५ ) ॥ ' अलातृणः ' अलमातर्दनो मेघः । ' बलः ' वृणोतेः । 'व्रजः' व्रजति अन्तरिक्षे । 'गोः' एतस्या माध्यमिकाया वाचः पुरा हननाद् भयमानो व्य़ार ॥ “सुगान् पथो अकृणोन्निरजेगाः ” सुगमनान् पथः अकरोत् निरजनाय गवाम् ॥ “ प्रावन्वाणीः पुरुहूतं धमन्तीः ॥ ” आपो वा वहनात् । वाचो वा वदनात् । बहुभिः-आहूतम्-उदकं भवति । धमति र्गतिकर्मा ॥ ३ ( २ ) ॥ 'अलातृणः' (५) यह अनवगत है । 'अलमातर्दन' यह अवगम है । “अलातृण” इस ऋचा का विश्वामित्र ऋषि, त्रिष्टुप् छन्द, इन्द्र देवता, पृष्ठ्य अभिप्लव के द्वितीय और पञ्चम दिन में मरुत्वान् सूक्त है, तहां यह माध्यन्दिन सवन में अच्छावाक के द्वारा शंस की जाती है ।—