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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

हिन्दी निरुक्त ( २३७ ) ६ अ० १ पा० ३ खं० [ इस प्रकार यहां वध के अधिकार से 'कुयारु' क्रूरान शील का नाम हो सकता है ॥ २ ( १ ) ॥ ( खं० ३ ) निघ०-अलातृणः ॥ ५ ॥ निरु०-“अलातृणो बल इन्द्र व्रजोगोः पुराहन्तो र्भयमानो व्य़ार । सुगान्पथो अकृणोन्निरजेगाः प्रावन्वाणीः पुरुहूतं धमन्तीः ॥” ( ऋ० सं० ३, २, २, ५ ) ॥ ' अलातृणः ' अलमातर्दनो मेघः । ' बलः ' वृणोतेः । 'व्रजः' व्रजति अन्तरिक्षे । 'गोः' एतस्या माध्यमिकाया वाचः पुरा हननाद् भयमानो व्य़ार ॥ “सुगान् पथो अकृणोन्निरजेगाः ” सुगमनान् पथः अकरोत् निरजनाय गवाम् ॥ “ प्रावन्वाणीः पुरुहूतं धमन्तीः ॥ ” आपो वा वहनात् । वाचो वा वदनात् । बहुभिः-आहूतम्-उदकं भवति । धमति र्गतिकर्मा ॥ ३ ( २ ) ॥ 'अलातृणः' (५) यह अनवगत है । 'अलमातर्दन' यह अवगम है । “अलातृण” इस ऋचा का विश्वामित्र ऋषि, त्रिष्टुप् छन्द, इन्द्र देवता, पृष्ठ्य अभिप्लव के द्वितीय और पञ्चम दिन में मरुत्वान् सूक्त है, तहां यह माध्यन्दिन सवन में अच्छावाक के द्वारा शंस की जाती है ।—

हिन्दी निरुक्त ( ३३८ ) ६ अ० १ पा० ४ खं० अर्थः- हे 'इन्द्र !' यह 'अलातृणः' ( अलमातर्दनः ) भिगोने को समर्थ (जलसे भराहुआ) 'वलः' मेघ ( क्यों ? 'वृणोति' आवरण करता है ) 'व्रजः' ( अन्तरिक्षे व्रजंति ) अन्तरिक्षमें चलने वाला 'गोः' (एतस्याः माध्यमिकाया वाचः) इस आपकी मध्यम लोक की वाणी गर्जना से 'हन्तोः' ( हन- नात् ) मारने से 'पुरा' पहिले ही 'भयमानः' डरता हुआ 'व्‍‍यार' (विश्नथी भवति) ढीला हो जाता है, यो होगया । तथा उस (मेघ) ने 'गाः' (गवाम्) (अपाम्) जलों के 'नि- रंजे' (निरजनाय ≈ निर्गमनाय) निकलने के लिये 'पथः' (मा- र्गान्) मार्गों को 'सुगान्' ( सुगमनान् ) सुन्दरगमनयोग्य 'अकृणोत्' ( अकरोत् ) किया । और निकले हुए 'वाशीः' (आपः) जल ( क्यों ? वहन (बहने) से ) 'पुरुहूतम्' (जलाशयम्) जल के स्थान कूप तडाग नदी आदि को 'धमन्तीः' जाते हुए 'प्रावन्' रक्षा करते हैं ॥ 'पुरुहूत' क्यों ? वह 'पुरुभिः' (बहुभिः) बहुतों से 'हूतम्' (आहूतम्) बुलाया हुआ होता है । 'धम' (ध्मा) (भ्वा० प०) धातु का गमन अर्थ है ॥ ३ ( २ ) ॥ ( खं० ४ ) (निघ०-) सललूकम् ॥६॥ कत्पयम् ॥७॥ विख्रुहः ॥८॥ वीरुधः ॥६॥ नक्तुद्दाभम्॥१०॥ अस्कृधोयुः ॥११॥ निश्टम्भाः ॥१२॥ (निरु०-) “उद्दर्हरक्षः सहमूलमिन्द्र वृश्चामध्यं प्रत्य- ग्रं शृणीहि । आकीवतः सललूकम् चकर्थ ब्रह्मद्विषे तपुषिं हेतिमस्य ।” ( ऋ० सं० ३, २, ४, २ )

हिन्दी निरुक्त (२३६) ६ अ० १ पा० ४ खं० उद्धर रक्षः सहमूल मिन्द्र । 'मूलं' मोचनाद्वा । मोषणाद्वा । मोहनाद्वा । वृश्च मध्यं प्रति शृणी- हि अग्रम् । 'अग्रम्' - आगतं भवति आकियतो देशात् । 'सललूकम्' संलुब्धं भवति पापकम् इति नैरुक्ताः । सरूकं वा स्यात् सर्त्तेः अभ्यस्तात् । 'तपुषिः' तपतेः । 'हेतिः' हन्तेः । “त्यं चिदित्था कत्पयं शयानम्” (ऋ०सं०४,१,३२,६) सुखपयसम् । सुखमस्य पयः । 'विस्रुहः' आपो भवन्ति । विस्रवणात् । “वयाइव रुरुहुः सप्त विस्रुहः” (ऋ०सं०४,५,९,६) इत्यपि निगमो भवति । 'वीरुधः' ओषधयो भवन्ति । विरोहणात् । “वीरुधः पारयिष्णवः” [ऋ० सं० ८, ५, ८, ३] इत्यपि निगमो भवति ॥४॥ 'नक्षद्दाभम्' अश्नुवानदाभम् । अभ्यशनेन दभ्नो- ति-इति । “नक्षद्दाभं ततुरिं पर्वतेष्ठाम्” (ऋ०सं० ४,६,१३,२) इत्यपि निगमो भवति । 'अस्कृधोयुः' अक्रुध्वायुः । 'कृधु' इति ह्रस्वनाम । निकृत्तं भवति ।

हिन्दी निरुक्त (२५०) ६ अ० १ पा० ४ खं० “यो अस्कृधोयुरजरः स्वर्वान् ” (ऋ०सं० ४, ६, १३, ३) इत्यपि निगमो भवति ॥ 'निश्रुम्भाः' निश्रध्यहारिणः ॥ ४ (३) ॥ 'सललूकम्' (६) यह अनवगत है । 'संलुब्धम्' अथवा 'सररूकम्' शब्द- समाधि है । 'उद्वृहरक्षः' का “अलातृण” के समान विनियोग है । (नि० ६,१,३) हे 'इन्द्र !', 'सहमूलम्' जड़-समेत 'रक्षः' राक्षस को 'उद्वृर्ह' (उद्धर) उखाड़दे । इसके 'मध्यम्' बीच को 'वृश्च' (वृश्च) छेददे । 'अग्रम्' इसके आगेको 'प्रति-शृणीहि' काटदे 'आकीवतः' (आ कियतो देशात् ) किसी स्थान से भी (इसे उखाड़दे ) [ जिससे वितर्क करने वालों को भी यह पता न चलसके कि- कहां से इसे नष्ट किया । या इस का कुछ भी शेष न रहे ऐसा खोदे । ] तथा इसे उखाड़ कर 'सललकम्' सहाय रहित (पातरहित) 'चकर्थ' (कुरु) करदे । 'ब्रह्मद्विषे' इसब्राह्मणके द्वेषी (शत्रु)के लिये 'तपुषिम्' ताप देनेवाली 'हेतिम्' (हन्त्रीम्)हनन करनेवाली आयुध जातिको 'अस्य' (क्षिप) फेंक ॥ 'मूल' कैसे ? मोचन (छोड़ने) से । [क्योंकि-वह छोड़ा जाता है ।] अथवा मोषण (चोरी से । [क्योंकि-वह लुकाया हुआ होता है ।] अथवा मोहन से । [क्योंकि-उसके ढूँढने में 'कहाँ है' ऐसा मोह होता है ।] 'अग्र' क्यों ? वह आगत (आया हुआ) होता है । 'सललूक' संलुब्ध (विज्ञान या गति-शून्य) होता है । पापतर (अधिक पाप) यह नैरुक्त [कहते हैं ।] अथवा 'सररूक' का 'सललूक' है । (सररूक) गति अर्थ में अभ्यस्त (दोहराएहुए) 'सृ (जु० प०) धातु से है । 'तपुषि' शब्द

संताप अर्थ में 'तप' ( भ्वा०प० ) धातु से है । [ क्योंकि-वह ताप देने वाली होती है । ] 'हेति' हिंसात्मक 'हन्' ( अदा० प० ) धातु से है । क्यों कि-उससे हनन किया जाता है । ] 'कत्पयम्' (७) यह अनवगत है । 'कपयम्' यह अवगत है ।— " 'त्यम्' (तम्) उस (मेघ) को 'चित्' (अनर्थक) 'कत्पयम्' (सुखपयसम्) सुखकारी जल वाला बनाकर 'शयानम्' (असूर्यम्) प्रकाश रहित करके (जघान) मारा" । [ 'यहां इन्द्र ने मारा' इस संबन्ध से 'कत्पयः' सुखपयः (सुखजल) सिद्ध होता है । ] 'विस्रुह' (८) जल होते हैं । [क्योंकि-] विशेष कर स्रुत होते (झरते) हैं । " 'वयाः' (शाखाः) शाखाओं के 'इव' समान [पृथिवी के ऊपर] 'सप्त' फैलने वाले सात 'विस्रुहः' जल (समुद्र) 'रुरुहुः' नदी आदि के रूप से फैले हुए हैं।" यह भी निगम है । 'वीरुध्' (६) (अनवगत) ओषधिएं होती हैं । क्यों ? विरोहण (पृथिवी को भेदकर उगने) से । " 'वीरुधः' ओषधिएं 'पारयिष्णवः' (तारयिष्णवः) रोगों से पार करने वाली हों" यह भी निगम होता है । [ इस मन्त्र में 'पुष्पवती' आदि विशेषणों के सम्बन्ध से 'वीरुध्'नाम ओ- षधियों का सिद्ध होता है । ] 'नक्षदाभम्' (१०) यह अनवगत है ।— 'नक्षदाभ' अश्नुवानदाभ होता है । क्यों कि-वह अ- भ्यश्न (अपने व्यापने) से मारता है । “नक्षदाभं ततुरिं पर्वतेष्ठाम्” अर्थात्- 'नक्षदाभम्' अपने व्यापने से मारने वाले 'ततुरि' त्वरा (शीघ्र) स्वभाव

हिन्दी निरुक्त ( २४२ ) ६ अ० १ पा० ५ खं०

वाले 'पर्वतेष्ठाम्' पर्वत (मेघ) पर रहने वाले (इन्द्रम्) इन्द्रको ।
यह भी निगम होता है (
'अकृधोयुः' (११) अनवगत अकृध्वायु (दीर्घायु) का नाम है ।
'अस्कृधोयु' क्या? अकृध्वायु । सो क्या ? 'कृधु' यह ह्रस्व
का नाम है। ( उस का निषेध 'अकृधु' (दीर्घ) आयु जिस
का हो ।)
" 'यः' जो (पुत्र) 'अस्कृधोयुः' दीर्घ आयु वाला 'अजरः'
दृढ शरीर 'रक्षोहाम्' शत्रुओं का भगाने वाला हो" यह भी
निगम है ।
'निशृम्भाः' (१२) यह अनवगत है । 'निश्वथ्यहारिण' यह अवगत है ।-
'निशृम्भ' ( १२ ) निश्वथ्यहारी न थक कर हरने वाले
होते हैं ॥ ४ (३) ॥
( खं० ५ )
[निघ०-]बृवदुक्थम् ॥१३॥ऋदूदरः॥१४॥
ऋदूपे ॥१५॥ पुल्लुकामः ॥१६॥ असिन्वती
॥१७॥ कपनाः ॥१८॥ मात्रञ्जीकः ॥१६॥
रुजानाः ॥२०॥ जूर्णिः ॥२१॥ ओमना
॥२२॥
(निरु०-) "आजासः पूषणं रथे निशृम्भास्ते जन-
श्रियम् । देवं वहन्तु बिभ्रथः।" (ऋ०सं०४,८,२१,६)
आवहन्तु अजाः पूषणं रथे निश्वथ्यहारिणस्ते ।
'जनश्रियं' जातश्रियम् ।

हिन्दी निरुक्ते ( २४३ ) ६ अ० १ पा० ५ खं० 'बृहदुक्थः' महदुक्थः । वक्तव्यम्-अस्मै--उक्थम् इति बृहदुक्थो वा । “बृहदुक्थं हवामहे” ( ऋ० सं० ६, ३, २, ५ ) इत्यपि निगमो भवति । 'ऋदूदरः' सोमः। मृदूदरः। मृदुः-उदरेषु इतिवा । “ऋदूदरेण सख्या सचेय” ( ऋ०सं०६,४,१२,५) इत्यपि निगमो भवति । 'ऋदूपे' इति-उपरिष्टाद् व्याख्यास्यामः । 'पुलुकामः' पुरुकामः । “पुलुकामो हि मर्त्यः” ( ऋ० मं० २, ४, २२, ५ ) इत्यपि निगमो भवति । 'असिन्वंती' असंखादन्त्यौ । “असिन्वती बप्सती भूर्यत्ततः” (ऋ०सं०६,३,१४,१) इत्यपि निगमो भवति । 'कपनाः' कम्पनाः क्रिमयो भवन्ति । “मोषंथा वृक्षे कपनेव वेधतः” (ऋ०सं०४,३,१५,१) इत्यपि निगमो भवति । 'भाऋजीकः' प्रसिद्धभाः । “धूमकेतुः समिधा भाऋजीकः” ( ऋ० सं० ७, ६, ११, २ ) इत्यपि निगमो भवति ।

हिन्दी निरुक्त ( २४४ ) ६ अ० १ पा० ५ खं०

'रुजानाः' नद्यो भवन्ति । रुजन्ति कूलानि ।
“संरुजानाः पिपिष इन्द्रशत्रुः” (ऋ० सं० १, २,
३७, १) इत्यपि निगमो भवति ॥
'जूर्णिः' जवते र्वा । द्रवते र्वा । दूनोते र्वा ।
"क्षिमा जूर्णिर्न वक्षति” (ऋ०सं० २,१,१७,३)
इत्यपि निगमो भवति ।
“परिभ्रंसमोमना वां वयोऽगात्” ॥ (ऋ० सं०
५, ५, १६, ४) पर्यगाद् वां भ्रंसमहः-अवनाय
अन्नम् ॥ ५ ( १ ) ॥
इति षष्ठाध्यायस्य प्रथमः पादः समाप्तः ॥६, १॥
"आजासः" यह ऋचा भरद्वाज ऋषि की है ।-
अर्थः-'ते' वे 'आजासः' (अजाः) नहीं जन्म लेने वाले
(नित्य) 'नियुग्मन्तः' (निश्चय्यहारिणः) दृढ गति से
हरने वाले (चलने वाले) घोड़े 'जातश्रियम्' जातश्रियम् प्रकट
हुई श्री वाले 'रथे' रथमें बैठे हुए 'पूषणम्' पूषा 'देवम्' देव को
'बिभ्रतः' धारण करते हुए 'आवहन्तु' लावें ।
'बृहदुक्थ' (१३) (अनवगत) 'महदुक्थ' (जिसका
बड़ा उक्थ या शस्त्र हो) होता है । अथवा वक्तव्य (कहने
योग्य) इसके अर्थ उक्थ है, इस से 'बृहदुक्थ' है ।
“बृहदुक्थं हवामहे” अर्थात्- 'बड़े उक्थ (शस्त्र)
वाले अथवा जिसके लिये उक्थ (शस्त्र) वक्तव्य (कहनेयोग्य)
है, उस (इन्द्र) को 'हवामहे' हम बुलाते हैं।' यह भी
निगम है ॥

हिन्दी निरुक्त ( २४५ ) ६ अ० १ पा० ४ खं०

'ऋदूदर' (अनवगत) सोम होता है। क्यों ? वह मृदूदर होता है, अर्थात् उसका उदर मृदुहोता है, या 'वह पीया हुआ उदर (पेट) में मृदु (कोमल) रहे ऐसे वचन की आशङ्का से प्रार्थना की जाती है, इससे वह मृदूदर होता हुआ 'ऋदूदर' होता है । “ऋदूदरेण सख्या सचेय” अर्थात्-'सख्या' किसी मित्र पुरुषके साथ जैसे, 'ऋदूदरेण' (सोमेन) सोमके साथ 'सचेय' संयुक्त होऊँ, [जिस प्रकार से कि-मैं इस सोमसे हिं- सित न हूं।] यह भी निगम होता है। 'ऋदूपे' (१५) इसकी व्याख्या आगे करेंगे। (पा०६खं.५) 'पुलुकाम' (१६) (अनवगत) पुरुकाम (बहुत कामना वाला) होता है। “पुलुकामोहि मर्त्यः” अर्थात्-'हि' क्योंकि-'मर्त्यः' मनुष्य 'पुलकामः' बहु कामनाओं वाला होता है, यह भी निगम होता है ॥ 'असिन्वती' (१७) (अनवगत) 'असंखादन्त्यौ (नहीं खाने वालीं) के अर्थ में है। “असिन्वती वप्सती भूर्यत्तः” अर्थात्-ये अग्नि देव की दो ज्वालाएँ 'असिन्वती' नहीं खाती हुईं जैसी 'वप्सती' (इस प्रकार शीघ्र) भक्षण करती हुईं 'भूरि' बहु काष्ठमात्रको या हविःमात्र को 'अत्तः' (फिर भी) खाती हैं, । यह भी निगम है। 'कपनाः' (१८) (अनवगत) 'कम्पनाः' (कँपाने वाले) के अर्थ में है। वे कौन ? क्रिमि (कीड़े) होते हैं। (क्योंकि- वे वृक्षको कम्पित करदेते हैं।)

हिन्दी निरुक्त ( २४६ ) ६ अ० १ पा० ५ खं० “मोषथा वृक्षं कपनेव वेधसः” अर्थात्-हे मरुतो ! तुम 'कपनाः' कँपाने वाले 'वेधसः' वेधने वाले कीड़े 'वृक्षम्-इव' वृक्षको जैसे 'मोषथा' ( मोषथ ) ( मेघको ) भेदन करो, । यह भी निगम है। 'भ्राजृजीकः ( १६ ) ( अनवगत ) 'प्रसिद्धभाः' (प्रसिद्ध कान्तिवाले ) के अर्थ में है । “धूमकेतुः समिधा भ्राजृजीकः” अर्थात्-हे अग्नि देव ! तू 'धूमकेतुः ' धूम से जाना जाता या धूमरूप केतु (ध्वजा ) वाला है, 'समिधा' धमाने से 'भा ऋजीकः' चमकने वाला है। यह भी निगम होता है। 'रुजानाः' ( २० ) (अनवगत) है । 'रुजान, क्या ? नदी होती हैं। क्यों ? वे कूलों (तटों) को रुजन (भंग) करती हैं। “संरुजानाः पिपिष इन्द्रशत्रुः” अर्थात्-' इन्द्रशत्रुः ' इन्द्र का शातयितव्य ( वध्य ) मेघ ' संरुजानाः ' नदियों के प्रति 'पिपिषे' चूर्ण होगया, । यह भी निगम होता है ॥ ' जूर्णिः' ( २१ ) ( अनवगत ) अथवा हिंसार्थक ' ज्र ' ( भ्वा०प० ) धातुसे है। अथवा गत्यर्थक 'द्रू' (भ्वा० प० ) धातुसे है। अथवा हिंसार्थक 'द्रू' ( स्वा० प० ) धातु से है । “क्षिप्ता जूर्णि र्न वक्षाति” अर्थात्-'क्षिप्ता' राक्षसों की फेंकी हुई 'जूर्णिः' शक्ति ( अस्त्रविशेष ) 'न-वक्षति' हमारे ऊपर न आवेगी, । यह भी निगम होता है ॥ ' ओमना ' ( २२ (अनवगत ) ('अवनाय' ) रक्षा या तृप्ति के लिये के अर्थ में ) है। “परिद्युम्नोमना यां - वयोऽगात् ” अर्थात्-हे

हिन्दी निरुक्त ( २४७ ) ६ अ० २ पा० १ खं० अश्विनों ! 'द्यु'मत्' (अह्नः) प्रतिदिन 'वाम्' तुम दोनों के प्रति 'ओमना' (अवनाय) तृप्ति के अर्थ 'वयः' (अन्नम्) (घृत आदि) 'परि-अगात् सब दिशाओं से जाता है ॥ ५ (४) ॥ इति हिन्दी निरुक्ते षष्ठाध्यायस्य प्रथमः पादः ॥ ६, १॥ द्वितीयः पादः । ( खं० १ ) निघ०- उपल प्रक्षिणी ॥ २३ ॥ निरु०- 'उपलप्रक्षिणी' उपलेषु प्रक्षिणाति। उपल- प्रक्षेपिणी वा । इन्द्र ऋषीन् पप्रच्छ-'दुर्भिक्ष केन जीवति' इति । तेषामेकः प्रत्युवाच— "शकटः शाकिनी गावो जालमस्यन्दनं वन- मुदधिः पर्वतो राजा दुर्भिक्षे नव वृत्तय" इति सा निगद्व्याख्याता ) ॥ १ ( ५ ) ॥ अर्थः-'उपलप्रक्षिणी' (२३) (अनवगत) [सत्तू बनाने वाली स्त्री का नाम है । ] क्यों ? वह यवों (जवों) को उपलों (पत्थरों) पर प्रक्षीण करती (कूटती या पीसती) है। अथवा वह तपाए हुए उपलों पर भूंजने के लिये यवों को प्रक्षेपण करती या डालती है । [ सो यह 'उपलप्रक्षेपिणी' को 'उपलप्रक्षिणी' (भड़भूजी) कही जाती है ।) [ इन्द्र ने ऋषियों से पूछा-दुर्भिक्ष (अकाल) में किस उपाय से मनुष्य जी सकता है ? उनमें एक ने उत्तर दिया कि- "शकट (गाड़ी, शाकिनी (शाककी भूमि) गोएँ, जाल (जलसे मछली आदि को पकड़ना), अस्यन्दन (नहर),

[Header] हिन्दी निरुक्त ( २४८ ) ६ अ० २ पा० २ खं०

[Body] वन, समुद्र, पर्वत, और राजा दुर्भिक्ष में नव ( ६ ) वृत्तिएं होती हैं सो यह पाठमात्र से ही व्याख्यान की गई है। ] ॥ १ ( ५ ) ॥ ( खं० २ ) निघ०- उपासि ॥२४॥ प्रकलवित् ॥२५॥ अभ्यर्द्द्यज्वा ॥ २६ ॥ ईक्षे ॥ २७ क्षो- णास्य ॥ २८ ॥ निरु०- "कारुरहं ततो भिषगुपलप्रक्षिणी नना नाना धियोवसूयवोऽनु गा इव तस्थिमेन्द्रा येन्दो परिस्रव ॥" (ऋ० सं० ७, ५, २५, ३ ) ॥ 'कारुः-अहम्-अस्मि'। कर्त्ता स्तोमानाम् । ततो भिषक् । 'तत' इति सन्ताननाम, पितुर्वा पुत्रस्य वा । 'उपलप्रक्षिणी' सक्तुकारिका । 'नना' नमतेः । माता वा । दुहिता वा । 'नानाधियो' नानाकर्माणः । 'वसूयवो' वसुकामाः । अन्वास्थि- ताः स्मो गाव इव लोकम् । 'इन्द्रायेन्दो परिस्रव' इति-अध्येपणा ॥ "आसीन ऊर्ध्वामुपसि क्षिणाति।" [ऋ० मं० ७, ७, १७, ३ ] उपस्थे ॥ 'प्रकलविद्' वणिग् भवति । कलाश्च वेद प्रकलाश्च ।

हिन्दी निरुक्त ( २४६ ) ६ अ० २ पा० ३ सं० “ दुर्मित्रासः प्रकलविन्मिमानाः ” ( ऋ० सं० ५, २, २६, ५, ) इत्यपि निगमो भवति ॥ 'अभ्यर्द्दयज्वा' अभ्यर्द्दयन् यजति । "सिषक्ति पूषा अभ्यर्द्दयज्वा" ( ऋ० सं ४, ८, ८, ५ ) इत्यपि निगमो भवति ॥ 'ईक्षे' ईशिषे । "ईक्षेहि वस्व उभयस्य राजन्" ( ऋ०सं० ४,६, ८, ५ ) इत्यपि निगमो भवति ॥ 'क्षोणस्य' क्षयणस्य । "महः क्षोणस्याश्विना कण्व्याय" [ ऋ० सं० १, ८, १४, ३ ] इत्यपि निगमो भवति ॥ २ (६) ॥ "कारुरहम्" यह ऋचा शिशु आंगिरस ऋषि की है। पङ्क्ति छन्द और इन्द्र देवता है । ऐसा स्मरण होता आया है कि-सोम क निचोड़ने पर जब वह न झरा (छना) तो ऋषि को आशंका हुई कि-यह मेरे दुष्कृत या पाप के कारण से नहीं झरता है और अपने पाप को अपने मुख से कहने से आत्मा की शुद्धि होती है, इस कारण ऋषि इस मन्त्र में अपना ही निर्देश करता हुआ कहता है— अर्थः-हे' इन्दो ! सोम ! ' अहम् ' मैं ' कारुः ' ( कर्त्ता स्तोमानाम् ) किसी अनादि कालमें दूसरोंके यज्ञ कर्ममें होता के रूप में कारु या स्तुतियोंका करने वाला ( अस्मि ) हूं या था, अथवा यज्ञसे अलग अपनी जीविका के अर्थ लौकिक बनावटी बातोंसे औरों के लिये मिठ बोला था । 'ततः' मेरा पिता अथवा पुत्र (क्योंकि-'ततः' इति सन्तान-नाम, पितुर्वा ३२

हिन्दी निरुक्त ( ३५१ ) ६ अ० २ पा० २ खं० निरुक्तार्थ-मैं कारूं हूं या थां । 'कारूं' क्या ? स्तोमों ( स्तुतियों ) का करने वाला । ( मेरा ) 'तत' भिषक् ( वैद्य या ब्रह्मा ) था । 'तत' यह सन्तान का नाम है । अथवा पिताका अथवा पुत्र का । 'उपलप्रक्षिणी' सक्तुओं को बनाने वाली । 'नना' 'नम' (स्वा० पँ०) धातु से है । अथवा माता । अथवा पुत्री । 'नानाधी क्या ? नानो (अनेक) कर्मों के करने वाले । 'वसूयु' क्या ? वसुओं धनों की कामना वाले । हम लोक के प्रति गोओं के समान अनुचर रूप से स्थित थे । हे इन्दो ! ( सोम ! ) तू इन्द्र के लिये झर । यह अध्येषणा ( सत्कार- पूर्वक किसी पूज्य या प्रतिष्ठित को प्रेरणा ) है [ इस मन्त्र में अपने दोषों को अपने मुख से कहने की महानुभावता और एक जीव के अनेक जन्मों का निदर्शन मिलता है तथा जन्म- कृत जाति की पुष्टि होती है, या जन्म का आत्मा पर बहुत काल तक पूरा प्रभाव रहता है, इत्यादि बातो का स्पष्ट वर्णन हैं । ] 'उपसि' (२४) अनवगतं 'उपस्थे' ( ऊपर के स्थान में ) के अर्थ में है । “आसीन ऊर्ध्वा मुपसिक्षिणाति" अर्थात्-'आसीनः' मध्यस्थान में बैठा हुआ इन्द्र 'ऊर्ध्वाम्' ऊपर स्थित हुई द्युलोक रूप गो को 'उपसि (उपस्थे) अपने ऊपर ( अन्तरिक्ष लोक में ) 'शिक्षति' (क्षारयति ) क्षारता है ॥ 'उपस्थे ऊपर के स्थान में ॥ 'प्रकलेवित्' (२५) (अनवगत ) वणिक् ( वाणिज्य करने वाला ) होता है । क्यों ? वह कलाओं को और प्रकलाओं को जानता है । [ 'कला' उपयोगी चतुराई के कामों को कहते हैं,

हिन्दी निरुक्त ( २५२ ) ६ अ० २ पा० २ खं० और उन्हों के भीतरी भेदों को ‘प्रकला’ कहते हैं । ] “दुर्मित्रासः प्रकलविन्मिमानाः” अर्थात्—‘दुर्मित्राः’ सुमित्र होकर भी अधिक सोच विचार रखने वाले (कंजूस) ‘प्रकलविदः’ (वणिजः) बाणिए, वे जिस प्रकार ‘मिमानाः’ माप कर देते हुए [अल्प (कम) देते हैं] यह भी निगम है । ‘अभ्यर्द्धयज्वा’ (२६) (अनवगत) ‘अभ्यर्द्धयन्यजति’ (जो बढाता हुआ यजन (दान) करता है) के अर्थ में है ।- “सिषक्ति पूषा अभ्यर्द्धयज्वा” अर्थात्—‘पूषा’ सूर्य अपनी रश्मियों (किरणों) से ‘अभ्यर्द्धयज्वा’ बड़े दान वाला ‘सिषक्ति’ सेचन करता (बरसता) है। यह भी निगम है । ‘ईक्षे’ (२७) (अनवगत) ‘ईशिषे’ (तू प्रभु होता है) के अर्थ में है ।- “ईक्षे हि वस्व उभयस्य राजन्” अर्थात् हे राजन् ! राजमान देव ! हि’ क्यों कि—(त्वम्) तू ‘उभयस्य’ द्युलोक और पृथिवी लोक के ‘वस्वः’ (वसुनः) धन का ‘ईक्षे’ (ईशिषे) स्वामी है। यह भी निगम है । यहां धन के सम्बन्ध से ‘ईक्षे’ ‘ईशिषे’ के अर्थ में सिद्ध होता है । ‘क्षोणस्य’ (२८) (अनवगत) ‘क्षयस्य’ (घर के) के अर्थ में है ।- “महः क्षोणस्याश्विना कण्व्राय” अर्थात् ‘अश्विना’ हे (अश्विनौ !) अश्विनौ ! ‘कण्वाय’ कण्व ऋषि के लिये ‘महः’ (महतः) बड़े ‘क्षोणस्य’ (क्षयस्य) घर के (दातारौ) देने वाले हो । यह भी निगम है ॥ यहां दानके सम्बन्ध से ‘क्षोण’ नाम घरका है ॥ २ (६) ॥

हिन्दी निरुक्त (२५३) ६ अ० २ पा० ३ खं० (खं० ३) [निघ०-] अस्मे ॥२६॥ पाथः ॥३०॥ सवीमनि ॥३१॥ सप्रथाः ॥३२॥ विदथा- नि ॥३३॥ (निरु-) “अस्मे ते बन्धुः” वयम्-इत्यर्थः । “अस्मे यातं नासत्या सजोषाः” (ऋ०सं० १,८, १९, ६) अस्मान्-इत्यर्थः । “अस्मे समानेभिर्वृषभ पौंस्येभिः” (ऋ०सं०२,३, २५, २,) अस्माभिः-इत्यर्थः ॥ “अस्मे प्रयन्धि मघवन्नृजीषिन्” (ऋ०सं०३,२, २०, ५) अस्मभ्यम्-इत्यर्थः । “अस्मे आराच्चिद् द्वेषः सनुतर्युयोतु” (ऋ०सं० ४, ७, ३२, ३) अस्मत् इत्यर्थः । “उर्व इव पप्रथे कामो अस्मे” (ऋ०सं० ३,२,४,४) अस्माकम्-इत्यर्थः । “अस्मे धत्त वसवो वसूनि” अस्मासु-इत्यर्थः । ‘पाथः’ अन्तरिक्षम् । पथा व्याख्यातम् । “श्येनो न दीयन्नन्वेति पाथः” (ऋ० सं० ५, ५, ५, ५) इत्यपि निगमो भवति ।

हिन्दी निरुक्त ( २६४ ) ६ अ० २ पा० ३ खं०

उदकम् अपि 'पाथः' उच्यते। पानात्।
"आचष्ट आसां पाथो नदीनाम्।" (ऋ०सं०
५, ३, २५,९-१०) इत्यपि निगमो भवति॥
अन्नम्-अपि 'पाथः' उच्यते। पानादेव।
"देवानां पाथ उपवक्षि विद्वान्।" (ऋ०सं०
६, २, २२, ५) इत्यपि निगमो भवति॥
'सवीमनि' प्रसवे।
"देवस्य वयं सवितुः सवीमनि।" (ऋ०सं०
५, १, १५, २) इत्यपि निगमो भवति॥
'सप्रथाः' सर्वतः पृथुः।
"त्वमग्ने सप्रथा असि।" (ऋ० सं० ४, १,
५, ४) इत्यपि निगमो भवति॥
'विदथानि' वेदनानि।
"विदथानि प्रचोदयन्।" (ऋ० सं० ३, १,
२९, २) इत्यपि निगमो भवति॥ ३ (७)॥
'अस्मे' (२६) यह पद सर्वविभक्त्यन्त है, इसीसे अनेकार्थ है। अर्थात्
एक ही 'अस्मे' यह शब्दरूप सातों विभक्तियों के अर्थ में रहता है, प्रकरण
के अनुसार उसका नियम होता है, जैसे कि-पहिले प्रथमा विभक्ति में उदा-
हरण है—
"अस्मे ते बन्धुः" 'अस्मे' (वयम्) हम 'ते' तेरे
(बन्धुः) बन्धु हैं। यह अर्थ है।
(२ या०) "अस्मे यातं नासत्या सजोषाः"

हिन्दी निरुक्त ( ३५५ ) ६ अ० २ पा० ३ खं० ‘नासत्या’ (नासत्यौ) हे अश्विनौ ! (युवाम् ) तुम दोनों स- जोषाः' मेरे साथ प्रीति करते हुए या आपस में प्रीति करते हुए ‘अस्मे’ (अस्मान् ) (प्रति) मेरे पास ‘आ-यातम्’ आओ। यहां ‘अस्मे’ का ‘अस्मान्’ द्वितीयान्त का अर्थ है। (३ या-) “अस्मे समानेभिर्वृषभ पौंस्येभिः” ‘वृषभ’ हे कामों के बरसने वाले इन्द्र देव ! ‘समानेभिः’ (स- मानैः) समान ‘पौंस्येभिः’ बल वालों ‘अस्मे’ (अस्माभिः) हम मरुतों के साथ ही [ तुमने बहुत कर्म किये हैं।] [ यहां ‘समानेभिः’ ‘पौंस्येभिः’ इन पदों के साथ सम्बन्ध होने के कारण ‘अस्मे’ यह ‘अस्माभिः’ (हमसे) तृतीया के अर्थ में है।] (४ चौं ) “अस्मे प्रयन्धि मघवन्नृजीषिन्” ‘मघवन्’ हे इन्द्र ! ‘ऋजीषिन्’ ऋजीष (सोम के सूखस) वाले ! ‘अस्मे’ (अस्मभ्यम् ) हमारे अर्थ ‘प्रयन्धि’ (देहि ) धन दे। यहां दान के सम्बन्ध से ‘अस्मे’ यह ‘अस्मभ्यम्’ (हमारे लिये) के अर्थ में है ॥ (५ मी-) “अस्मे आराच्चिद् द्वेषः सनुतर्युयोतु” (इन्द्र.) इन्द्रदेव ‘अस्मे’ (अस्मत) हम से ‘आराच्चित्’ दूर कहीं ले जाकर ‘सनुतः’ हमसे परोक्ष ‘द्वेषः’ पाप को ‘युयोतु’ (नाश- यतु) नाश करे। यहां ‘आरात्’ (दूर ) पद के योग से ‘अस्मे’ (अस्मत् यह पञ्चमी के अर्थ में है। (६ ष्ठी-) “ऊर्व इव पप्रथे कामो अस्मे” हे इन्द्र! ‘अस्मे’ (अस्माकम् ) हमारा ‘कामः’ काम या मनोरथ ‘ऊर्वः-इव’ बड़वानल अग्नि के समान ‘पप्रथे’ (प्रथते) बढता है, या बढ़े। यहां ‘कामः’ पद के साथ सम्बन्ध होने के कारण ‘अस्मे’ यह ‘अस्माकम्’ (हमारा) के अर्थ में षष्ठी का रूप है।

(७ मी) “अस्मे धत्त वसवो वसूनि” हे 'वसवः' वसुओ ! 'अस्मे' (अस्मासु) हम में 'वसूनि' (धनानि) धनों को 'धत्त' तुम धारण करो ॥ यहां धारण क्रिया के संबन्ध से 'अस्मे' यह (अस्मासु) हममें इसके अर्थ में अधिकरण कारक में सप्तमी है ॥ 'पाथः' ( अनवगत और अनेकार्थ ) अन्तरिक्ष (आकाश) होता है । इसकी 'पथिन्' (पन्थाः) के समान व्याख्या है । “श्येनो न दीयन्नन्वेति पाथः” अर्थात्-सूर्यदेव 'श्येनः-इव' बाज के समान 'दीयन्' ( गच्छन् ) गमन करता हुआ 'पाथः' अन्तरिक्ष ( आकाश ) में 'अन्वेति' देवनिर्मित मार्ग से जाता है । यह भी निगम है । यहां सूर्य के वर्णन के सम्बन्ध से 'पाथः' अन्तरिक्ष है । उदक (जल) भी 'पाथस्' (पाथः) कहा जाता है । क्यों ? पान से । अर्थात् वह पीया जाता है, इससे 'पाथस्' है । “आचष्ट आसां पाथो नदीनाम्” अर्थात्-(वरुणः) वरुण देव 'आसाम्' इन 'नदीनाम्' नदियों के 'पाथः' जलको 'आचष्टे' ( कथयति-इव ) कहता जैसा है । यह भी निगम है ॥ यहां नदियों के संबन्ध से 'पाथः' जल है । अन्न भी 'पाथः' कहा जाता है। क्यों ? पानसे । अर्थात् वह भी प्राणधारणा के लिये पीया जाता है । “देवानां पाथ उपवक्षि विद्वान्” अर्थात्-हे (वन- स्पते !) वनस्पति देव ! 'विद्वान्' अपने अधिकार को जानने वाला (त्वम्) तू 'देवानाम्' देवताओं को 'पाथः' हविः-रूप अन्न 'उपवक्षि' पहुंचाता है । यह भी निगम है । यहां देव-

हिन्दी निरुक्त (२५७) ६ अ० २ पा० ४ खं० ताओं के पास पहुंचाने के संबन्ध से 'पाथः' अन्न है ॥ 'सवीमनि' ( ३१ ) शब्द 'प्रसवे' ( आज्ञा में ) के अर्थ में है । “देवस्य वयं सवितुः सवीमनि” अर्थात्-'वयम्' हम 'सवितुः' सूर्य 'देवस्य' देव के 'सवीमनि (प्रसवे) आज्ञा में (रहते हैं) । यह भी निगम है। यहां सूर्य देवके सम्बन्ध से 'सवीमनि' 'प्रसवे' (आज्ञामें) के अर्थ में है ॥ 'सप्रथाः' ( ३२ ) क्या ? 'सर्वतः पृथुः' सब ओर मोटा । “त्वमग्ने सप्रथा असि” 'अग्ने' हे अग्निदेव ! (त्वम्) तू 'सप्रथाः' सब ओर से मोटा 'असि' है ॥ यहां शब्द की समानता और अर्थ के घटनेसे 'सप्रथाः' 'सर्वतःपृथुः' के अर्थ में है ॥ 'विदथानि' ( ३३ ) पद 'वेदनानि' (विज्ञान) के अर्थ में है । “विदथानि प्रचोदयन्” विज्ञानां को अनुग्रह करता हुआ' । यह भी निगम है। क्योंकि-अग्नि देव के प्रकाश से ही सब विज्ञान (प्रत्यक्षज्ञान) अनुगृहीत होते हैं, इससे यहां 'विदथ' नाम विज्ञान का है ॥ ३ (७) ॥ ( खं० ४ ) निघ०-श्रायन्तः ॥३४॥ आशीः ॥३५॥ निरु०-“श्रायन्त इव सूर्य्यं विश्वेदिन्द्रस्य भक्षत। वसूनि जाते जनमान ओजसा प्रतिभागं न दीधिम ॥” (ऋ० सं० ६, ७, ३, ३] ३३