निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त (२५०) ६ अ० १ पा० ४ खं० “यो अस्कृधोयुरजरः स्वर्वान् ” (ऋ०सं० ४, ६, १३, ३) इत्यपि निगमो भवति ॥ 'निश्रुम्भाः' निश्रध्यहारिणः ॥ ४ (३) ॥ 'सललूकम्' (६) यह अनवगत है । 'संलुब्धम्' अथवा 'सररूकम्' शब्द- समाधि है । 'उद्वृहरक्षः' का “अलातृण” के समान विनियोग है । (नि० ६,१,३) हे 'इन्द्र !', 'सहमूलम्' जड़-समेत 'रक्षः' राक्षस को 'उद्वृर्ह' (उद्धर) उखाड़दे । इसके 'मध्यम्' बीच को 'वृश्च' (वृश्च) छेददे । 'अग्रम्' इसके आगेको 'प्रति-शृणीहि' काटदे 'आकीवतः' (आ कियतो देशात् ) किसी स्थान से भी (इसे उखाड़दे ) [ जिससे वितर्क करने वालों को भी यह पता न चलसके कि- कहां से इसे नष्ट किया । या इस का कुछ भी शेष न रहे ऐसा खोदे । ] तथा इसे उखाड़ कर 'सललकम्' सहाय रहित (पातरहित) 'चकर्थ' (कुरु) करदे । 'ब्रह्मद्विषे' इसब्राह्मणके द्वेषी (शत्रु)के लिये 'तपुषिम्' ताप देनेवाली 'हेतिम्' (हन्त्रीम्)हनन करनेवाली आयुध जातिको 'अस्य' (क्षिप) फेंक ॥ 'मूल' कैसे ? मोचन (छोड़ने) से । [क्योंकि-वह छोड़ा जाता है ।] अथवा मोषण (चोरी से । [क्योंकि-वह लुकाया हुआ होता है ।] अथवा मोहन से । [क्योंकि-उसके ढूँढने में 'कहाँ है' ऐसा मोह होता है ।] 'अग्र' क्यों ? वह आगत (आया हुआ) होता है । 'सललूक' संलुब्ध (विज्ञान या गति-शून्य) होता है । पापतर (अधिक पाप) यह नैरुक्त [कहते हैं ।] अथवा 'सररूक' का 'सललूक' है । (सररूक) गति अर्थ में अभ्यस्त (दोहराएहुए) 'सृ (जु० प०) धातु से है । 'तपुषि' शब्द