निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( २४५ ) ६ अ० १ पा० ४ खं०
'ऋदूदर' (अनवगत) सोम होता है। क्यों ? वह मृदूदर होता है, अर्थात् उसका उदर मृदुहोता है, या 'वह पीया हुआ उदर (पेट) में मृदु (कोमल) रहे ऐसे वचन की आशङ्का से प्रार्थना की जाती है, इससे वह मृदूदर होता हुआ 'ऋदूदर' होता है । “ऋदूदरेण सख्या सचेय” अर्थात्-'सख्या' किसी मित्र पुरुषके साथ जैसे, 'ऋदूदरेण' (सोमेन) सोमके साथ 'सचेय' संयुक्त होऊँ, [जिस प्रकार से कि-मैं इस सोमसे हिं- सित न हूं।] यह भी निगम होता है। 'ऋदूपे' (१५) इसकी व्याख्या आगे करेंगे। (पा०६खं.५) 'पुलुकाम' (१६) (अनवगत) पुरुकाम (बहुत कामना वाला) होता है। “पुलुकामोहि मर्त्यः” अर्थात्-'हि' क्योंकि-'मर्त्यः' मनुष्य 'पुलकामः' बहु कामनाओं वाला होता है, यह भी निगम होता है ॥ 'असिन्वती' (१७) (अनवगत) 'असंखादन्त्यौ (नहीं खाने वालीं) के अर्थ में है। “असिन्वती वप्सती भूर्यत्तः” अर्थात्-ये अग्नि देव की दो ज्वालाएँ 'असिन्वती' नहीं खाती हुईं जैसी 'वप्सती' (इस प्रकार शीघ्र) भक्षण करती हुईं 'भूरि' बहु काष्ठमात्रको या हविःमात्र को 'अत्तः' (फिर भी) खाती हैं, । यह भी निगम है। 'कपनाः' (१८) (अनवगत) 'कम्पनाः' (कँपाने वाले) के अर्थ में है। वे कौन ? क्रिमि (कीड़े) होते हैं। (क्योंकि- वे वृक्षको कम्पित करदेते हैं।)