निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ
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हिन्दी निरुक्त ( २४४ ) ६ अ० १ पा० ५ खं०
'रुजानाः' नद्यो भवन्ति । रुजन्ति कूलानि ।
“संरुजानाः पिपिष इन्द्रशत्रुः” (ऋ० सं० १, २,
३७, १) इत्यपि निगमो भवति ॥
'जूर्णिः' जवते र्वा । द्रवते र्वा । दूनोते र्वा ।
"क्षिमा जूर्णिर्न वक्षति” (ऋ०सं० २,१,१७,३)
इत्यपि निगमो भवति ।
“परिभ्रंसमोमना वां वयोऽगात्” ॥ (ऋ० सं०
५, ५, १६, ४) पर्यगाद् वां भ्रंसमहः-अवनाय
अन्नम् ॥ ५ ( १ ) ॥
इति षष्ठाध्यायस्य प्रथमः पादः समाप्तः ॥६, १॥
"आजासः" यह ऋचा भरद्वाज ऋषि की है ।-
अर्थः-'ते' वे 'आजासः' (अजाः) नहीं जन्म लेने वाले
(नित्य) 'नियुग्मन्तः' (निश्चय्यहारिणः) दृढ गति से
हरने वाले (चलने वाले) घोड़े 'जातश्रियम्' जातश्रियम् प्रकट
हुई श्री वाले 'रथे' रथमें बैठे हुए 'पूषणम्' पूषा 'देवम्' देव को
'बिभ्रतः' धारण करते हुए 'आवहन्तु' लावें ।
'बृहदुक्थ' (१३) (अनवगत) 'महदुक्थ' (जिसका
बड़ा उक्थ या शस्त्र हो) होता है । अथवा वक्तव्य (कहने
योग्य) इसके अर्थ उक्थ है, इस से 'बृहदुक्थ' है ।
“बृहदुक्थं हवामहे” अर्थात्- 'बड़े उक्थ (शस्त्र)
वाले अथवा जिसके लिये उक्थ (शस्त्र) वक्तव्य (कहनेयोग्य)
है, उस (इन्द्र) को 'हवामहे' हम बुलाते हैं।' यह भी
निगम है ॥