निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( २४६ ) ६ अ० १ पा० ५ खं० “मोषथा वृक्षं कपनेव वेधसः” अर्थात्-हे मरुतो ! तुम 'कपनाः' कँपाने वाले 'वेधसः' वेधने वाले कीड़े 'वृक्षम्-इव' वृक्षको जैसे 'मोषथा' ( मोषथ ) ( मेघको ) भेदन करो, । यह भी निगम है। 'भ्राजृजीकः ( १६ ) ( अनवगत ) 'प्रसिद्धभाः' (प्रसिद्ध कान्तिवाले ) के अर्थ में है । “धूमकेतुः समिधा भ्राजृजीकः” अर्थात्-हे अग्नि देव ! तू 'धूमकेतुः ' धूम से जाना जाता या धूमरूप केतु (ध्वजा ) वाला है, 'समिधा' धमाने से 'भा ऋजीकः' चमकने वाला है। यह भी निगम होता है। 'रुजानाः' ( २० ) (अनवगत) है । 'रुजान, क्या ? नदी होती हैं। क्यों ? वे कूलों (तटों) को रुजन (भंग) करती हैं। “संरुजानाः पिपिष इन्द्रशत्रुः” अर्थात्-' इन्द्रशत्रुः ' इन्द्र का शातयितव्य ( वध्य ) मेघ ' संरुजानाः ' नदियों के प्रति 'पिपिषे' चूर्ण होगया, । यह भी निगम होता है ॥ ' जूर्णिः' ( २१ ) ( अनवगत ) अथवा हिंसार्थक ' ज्र ' ( भ्वा०प० ) धातुसे है। अथवा गत्यर्थक 'द्रू' (भ्वा० प० ) धातुसे है। अथवा हिंसार्थक 'द्रू' ( स्वा० प० ) धातु से है । “क्षिप्ता जूर्णि र्न वक्षाति” अर्थात्-'क्षिप्ता' राक्षसों की फेंकी हुई 'जूर्णिः' शक्ति ( अस्त्रविशेष ) 'न-वक्षति' हमारे ऊपर न आवेगी, । यह भी निगम होता है ॥ ' ओमना ' ( २२ (अनवगत ) ('अवनाय' ) रक्षा या तृप्ति के लिये के अर्थ में ) है। “परिद्युम्नोमना यां - वयोऽगात् ” अर्थात्-हे