भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 662, कुल 1282 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 662

हिन्दी निरुक्त ( २४७ ) ६ अ० २ पा० १ खं० अश्विनों ! 'द्यु'मत्' (अह्नः) प्रतिदिन 'वाम्' तुम दोनों के प्रति 'ओमना' (अवनाय) तृप्ति के अर्थ 'वयः' (अन्नम्) (घृत आदि) 'परि-अगात् सब दिशाओं से जाता है ॥ ५ (४) ॥ इति हिन्दी निरुक्ते षष्ठाध्यायस्य प्रथमः पादः ॥ ६, १॥ द्वितीयः पादः । ( खं० १ ) निघ०- उपल प्रक्षिणी ॥ २३ ॥ निरु०- 'उपलप्रक्षिणी' उपलेषु प्रक्षिणाति। उपल- प्रक्षेपिणी वा । इन्द्र ऋषीन् पप्रच्छ-'दुर्भिक्ष केन जीवति' इति । तेषामेकः प्रत्युवाच— "शकटः शाकिनी गावो जालमस्यन्दनं वन- मुदधिः पर्वतो राजा दुर्भिक्षे नव वृत्तय" इति सा निगद्व्याख्याता ) ॥ १ ( ५ ) ॥ अर्थः-'उपलप्रक्षिणी' (२३) (अनवगत) [सत्तू बनाने वाली स्त्री का नाम है । ] क्यों ? वह यवों (जवों) को उपलों (पत्थरों) पर प्रक्षीण करती (कूटती या पीसती) है। अथवा वह तपाए हुए उपलों पर भूंजने के लिये यवों को प्रक्षेपण करती या डालती है । [ सो यह 'उपलप्रक्षेपिणी' को 'उपलप्रक्षिणी' (भड़भूजी) कही जाती है ।) [ इन्द्र ने ऋषियों से पूछा-दुर्भिक्ष (अकाल) में किस उपाय से मनुष्य जी सकता है ? उनमें एक ने उत्तर दिया कि- "शकट (गाड़ी, शाकिनी (शाककी भूमि) गोएँ, जाल (जलसे मछली आदि को पकड़ना), अस्यन्दन (नहर),