भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 657

हिन्दी निरुक्त ( २४२ ) ६ अ० १ पा० ५ खं०

वाले 'पर्वतेष्ठाम्' पर्वत (मेघ) पर रहने वाले (इन्द्रम्) इन्द्रको ।
यह भी निगम होता है (
'अकृधोयुः' (११) अनवगत अकृध्वायु (दीर्घायु) का नाम है ।
'अस्कृधोयु' क्या? अकृध्वायु । सो क्या ? 'कृधु' यह ह्रस्व
का नाम है। ( उस का निषेध 'अकृधु' (दीर्घ) आयु जिस
का हो ।)
" 'यः' जो (पुत्र) 'अस्कृधोयुः' दीर्घ आयु वाला 'अजरः'
दृढ शरीर 'रक्षोहाम्' शत्रुओं का भगाने वाला हो" यह भी
निगम है ।
'निशृम्भाः' (१२) यह अनवगत है । 'निश्वथ्यहारिण' यह अवगत है ।-
'निशृम्भ' ( १२ ) निश्वथ्यहारी न थक कर हरने वाले
होते हैं ॥ ४ (३) ॥
( खं० ५ )
[निघ०-]बृवदुक्थम् ॥१३॥ऋदूदरः॥१४॥
ऋदूपे ॥१५॥ पुल्लुकामः ॥१६॥ असिन्वती
॥१७॥ कपनाः ॥१८॥ मात्रञ्जीकः ॥१६॥
रुजानाः ॥२०॥ जूर्णिः ॥२१॥ ओमना
॥२२॥
(निरु०-) "आजासः पूषणं रथे निशृम्भास्ते जन-
श्रियम् । देवं वहन्तु बिभ्रथः।" (ऋ०सं०४,८,२१,६)
आवहन्तु अजाः पूषणं रथे निश्वथ्यहारिणस्ते ।
'जनश्रियं' जातश्रियम् ।