भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 664

हिन्दी निरुक्त ( २४६ ) ६ अ० २ पा० ३ सं० “ दुर्मित्रासः प्रकलविन्मिमानाः ” ( ऋ० सं० ५, २, २६, ५, ) इत्यपि निगमो भवति ॥ 'अभ्यर्द्दयज्वा' अभ्यर्द्दयन् यजति । "सिषक्ति पूषा अभ्यर्द्दयज्वा" ( ऋ० सं ४, ८, ८, ५ ) इत्यपि निगमो भवति ॥ 'ईक्षे' ईशिषे । "ईक्षेहि वस्व उभयस्य राजन्" ( ऋ०सं० ४,६, ८, ५ ) इत्यपि निगमो भवति ॥ 'क्षोणस्य' क्षयणस्य । "महः क्षोणस्याश्विना कण्व्याय" [ ऋ० सं० १, ८, १४, ३ ] इत्यपि निगमो भवति ॥ २ (६) ॥ "कारुरहम्" यह ऋचा शिशु आंगिरस ऋषि की है। पङ्क्ति छन्द और इन्द्र देवता है । ऐसा स्मरण होता आया है कि-सोम क निचोड़ने पर जब वह न झरा (छना) तो ऋषि को आशंका हुई कि-यह मेरे दुष्कृत या पाप के कारण से नहीं झरता है और अपने पाप को अपने मुख से कहने से आत्मा की शुद्धि होती है, इस कारण ऋषि इस मन्त्र में अपना ही निर्देश करता हुआ कहता है— अर्थः-हे' इन्दो ! सोम ! ' अहम् ' मैं ' कारुः ' ( कर्त्ता स्तोमानाम् ) किसी अनादि कालमें दूसरोंके यज्ञ कर्ममें होता के रूप में कारु या स्तुतियोंका करने वाला ( अस्मि ) हूं या था, अथवा यज्ञसे अलग अपनी जीविका के अर्थ लौकिक बनावटी बातोंसे औरों के लिये मिठ बोला था । 'ततः' मेरा पिता अथवा पुत्र (क्योंकि-'ततः' इति सन्तान-नाम, पितुर्वा ३२