भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 678

हिन्दी निरुक्त (२६४) ६ अ० २ पा० ६ खं० "युवाभ्या मिन्द्राग्नी स्तोमं जनयामि नव्यम्" नवतरम् । 'ओमासः' इति उपरिष्टाद् व्याख्यास्यामः ॥ ६ (९) ॥ इति षष्ठाध्यायस्य द्वितीयः पादः ॥ ६, २ ॥ 'अश्रवंहि' यह ऋचा कुत्स ऋषि की है। इसका त्रिष्टुप् छन्द है। अर्थ-'इन्द्राग्नी !' हे इन्द्र अग्नि देवो ! ( अहम् ) मैंने 'वाम्' तुम दोनों को 'विजामातुः' ( असुसमाप्ताज्जामातुः ) अधूरे जामाता या जँवाई से 'वा' अथवा 'घा' (अनर्थक) 'श्या- लात्' साले से 'भूरिदावत्तरा' (बहुदातृतरौ) अधिक धनके देने वाले 'अश्रौषम्' सुना है । 'अथा' इस से 'सोमस्य' सोम के 'प्रयती' ( प्रदानेन ) प्रदान (दान) से 'युवाभ्याम्' तुम दोनों के लिये 'नव्यम्' (नवतरम्) बहुत नया 'स्तोमम्' स्तोत्र 'जन- यामि' (उच्चारयामि) उच्चारण करता हूं। इस प्रकार यहां पर 'विजामातृ' शब्द से अधूरा जमाई कहा जाता है, क्यों कि- वह जामाता के गुणों से हीन होने के कारण कन्या के पिता आदि को बहुत धन देकर उन्हें अपने अनुकूल करता है, इसी से वह बहुदाता है, और उसकी अपेक्षा इन्द्राग्नी देवता अधिक देने वाले कहे जाने से उनकी स्तुति होती है । यह बात प्रसिद्ध है कि-दक्षिणी लोग क्रीतापति (खरीदी हुई स्त्री) के पति को 'विजामाता' कहते हैं। क्यों कि-वह विगुण होने से अपनी भार्या बनाने के अर्थ कन्या को खरीदता है। इसीसे वह असुसमाप्त (अधूरा) जैसा वर माना गया है । 'जामाता' क्यों ? 'जा' अपत्य या सन्तान का नाम है,