निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( २६५ ) ६ अ० ३ पा० १ खं०
उसका निर्माता होता है, अर्थात् वह मैथुनधर्म के द्वारा उस (कन्या) में स्त्रीत्व (भार्यापन) को बनाता है, इसी से दुहिता का पति 'जामाता' कहलाता है। 'स्याल' क्यों ? संयोग से आसन्न (समीप-वर्त्ती) है। यह शब्द के निदान के जानने वाले विद्वान् मानते हैं। अथवा 'स्य' (छाज) से लाजों (धानकी खीलों) को कन्या की अञ्जलि में होम के अर्थ प्रावाप करता (घालता) है। 'लाज' कैसे ? 'लाज्' (भ्वा० प०) धातु से है। 'स्य' क्या? शूर्प (छाज) कैसे ? फेंकने अर्थ वाले 'स्य' (सो) (दि० प०) धातु से है। क्योंकि-उससे तुष (अन्नके छिलके) फेंके जाते हैं। 'शूर्प' क्यों ? वह अशन-पवन है, अर्थात्-उससे अशन (खाने योग्य अन्न) पवन (पवित्र) किया जाता है। अथवा हिंसाार्थक 'शृ' (क्रया० प०) धातु से है। क्यों कि-वह शरों (सींखों) से बना हुआ होता है। 'ओमासः' (४१) शब्दकी व्याख्या बारहवें अध्याय में "ओमासश्चर्षणी धृतः” इस मन्त्र में होगी ॥६,२॥ इति हिन्दीनिरुक्ते षष्ठाध्याये द्वितीयः पादः समाप्तः ॥ तृतीयः पादः । (खं० १) [निघ०-] सोमानम् ॥४२॥ (निरु०-) "सोमानं स्वरणं कृणुहि ब्रह्मणस्पते । क- क्षीवन्तं य औशिजः ।" [ य० सं० ३, २८ ]