भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 680

हिन्दी निरुक्त ( २६६ ) ६ अ० ३ पा० १ खं० सोमानं सोतारं प्रकाशनवन्तं कुरु ब्रह्मणस्पते कक्षीवन्तमिव य औशिजः । 'कक्षीवान्' कक्ष्यावान् । 'औशिजः' उशिजः पुत्रः । 'उशिक्' वष्टेः कान्तिकर्मणः । अपितु अयं मनुष्यकक्षएव अभिप्रेतः स्यात् । तं सोमानं सोतारं मां प्रकाशनवन्तं कुरु ब्रह्मण- स्पते ॥ १ (१०) ॥ अर्थः-'सोमानम्' (४२) यह (अनवगत) 'सोतारम्' (उ- त्पन्न करने वाले) के अर्थ में है— "सोमानं ०—०" यह ऋचा काण्व मेधातिथि ऋषि की है। अग्नि के उपस्थान में विनियुक्त है। 'सोमानम्' (सोमानाम्) अनेक सोमों के (सोतारम्) उत्पन्न करने वाले 'स्वरणम्' (शब्दयितारम्) स्तुति करने वाले (माम्) मुझ को 'ब्रह्मणस्पते' हे ब्रह्मणस्पति देव ! 'यः' जो 'औशिजः' (उशिजः पुत्रः) उशिक् का पुत्र (कक्षीवान्) कक्षीवान् (कक्ष्या- वान्) है, 'कक्षीवन्तम्' (इव) उस कक्षीवान् के समान (प्रका- शनवन्तम्) प्रकाश वाला 'कृणुहि' (कुरु) कर। इस प्रकार यहां शब्द की समानता से 'सोमानम्' का 'सोमानाम्' (सोमों का) परिवर्तन हो सकता है। 'कक्षीवान्' क्या ? कक्ष्यावान् अर्थात्-कक्ष्या (बगल या काख) वाला होता है। अथवा यह 'कक्ष' मनुष्य का कक्ष ही माना जा सकता है। क्योंकि-वह कक्ष में उत्पन्न है, इस से