भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 681

हिन्दी निरुक्त (२६७) ६ अ० ३ पा २ खं० (कक्ष (काख) में उत्पत्ति के संयोग से) वह 'कक्षीवान्' है। पहिली व्याख्या में वह स्वयम् काख वाला है, और दूसरी व्याख्या में वह काख से उत्पन्न हुआ है, यह भेद है। 'औशिज' क्या? उशिज् का पुत्र। 'उशिज्' कैसे ? कान्ति अर्थ वाले 'वश्' (अदा० प०) धातु से है। 'कक्षोवन्तम्' यह लुप्त उपमा है, उपमा का वाचक इव' पद ऊपर से लिया जाता है। 'प्रकाशनवन्तम्' (प्रकाश वाला) पद भाष्यकारने ऊपरसे ले लिया है। क्यों कि-अर्थ की पूर्त्ति ऐसा करने से ही होती है ॥१(१०)॥ (खं० २) निघ०-अनवायम्॥४३॥किमीदिने॥४४॥ निरु०- "इन्द्रासोमा समघशंस मभ्य १ घं तपुर्य- यस्तु चरुरग्निवां इव। ब्रह्मद्विषे क्रव्यादे घोरचक्षसे द्वेषोधत्तम नवायँ किमीदिने ॥" (ऋ० सं० ५, ७, ५, २)। इन्द्रासौमौ अघस्य शंसितारम्। 'अघं' हन्तेः। निर्ह्रासितोपसर्ग आहन्ति-इति। 'तपुः' तपतेः। 'चरुः' मृन्मयो भवति। चरतेर्वा। समुच्चरन्ति अस्मात् आपः।