भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 682

हिन्दी निरुक्त ( २६८ ) ६ अ० ३ पा० २ खं० 'ब्रह्मद्विषे' ब्राह्मणद्वेष्ट्रे । 'क्रव्यादे' क्रव्यमदते । 'घोरचक्षसे' घोरख्यानाय । 'क्रव्यं, 'विकृत्तात् जायते'–इति नैरुक्ताः । द्वेषो धत्तम् । 'अनवायम्' अनवयवम् । यत् अन्ये न व्यवेयुः, अद्वेषसः–इति वा । 'किमीदिने' किमिदानीम्–इतिचरते । 'किमिदं किमिदम्'–इति वा पिशुनाय चरते । 'पिशुनः' पिंशतेः । विपिंशति–इति ॥ २ (११) ॥ 'अनवायम्' (४३) 'किमीदिने' (४४) ये दो पद अनवगत हैं । 'अनवाय' शब्द अनवयव (अवयव (भाग) रहित) के अर्थमें और 'किमीदिने' शब्द 'किमिद किमिदम्' ( यह क्या ? यह क्या ? ) ऐसा करने वाला (धूर्त्त) के अर्थ में है । " इन्द्रासोमा " यह वसिष्ठ ऋषि की है । अर्थः—'इन्द्रासोमा' ( इन्द्रासोमो ) हे इन्द्र सोम देवो ! ( युवाम् ) तुम दोनों 'अघशंसम्' ( अघस्य शंसितारम् ) पाप की प्रशंसा करने वाले 'अभ्यघम्' पाप को ही करने को सदा संमुख रहने वाले को 'स ( तापयतम् ) सताओ । वह पापी 'तपुः' तुम दोनों से सताया हुआ 'अग्निमान्' अग्नि से संयुक्त 'चरुः–इव' होम- द्रव्य के समान 'ययस्तु' ( क्षयं यातु ) नष्ट हो जाय । 'ब्रह्मद्विषे' ( ब्राह्मणद्वेष्ट्रे ) ब्राह्मणों से द्वेष (वैर) करने वाले 'क्रव्यादे' ( क्रव्यम्–अदते ) मांस के खाने वाले 'घोरचक्षसे'