निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ
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हिन्दी निरुक्त ( २६६ ) ६ अ० ३ पा ३ खं०
घोर दर्शन वाले 'किमीदिने' (पिशुनाय) धूर्त्त के लिये
'अनवायम्' पूरा (अखण्ड) 'द्वेषः' द्वेष (बैर) 'धत्तम्'
धारण करो।
'अघ' कैसे ? हिंसाार्थक 'हन्' (अदा० प०) धातु से है।
[क्योंकि वह हनन (नाश) किया जाता है।] 'हन्' धातु से
किस प्रकार ? ह्रस्व किया हुआ उपसर्ग 'आहन्ति' इससे।
['आ' का 'अ' और 'ह' का 'घ' हो जाता है।]
'तपुः' कैसे ? संताप अर्थमें 'तप' (भ्वा०प०) धातु से है।
'चरुः' क्या ? 'मृच्चय' (मिट्टी से संचित) होता है।
अथवा 'चर' (भ्वा० प०) धातु से है। क्योंकि-इस से जल
समुच्चरण करते (उछलते) हैं।
'क्रव्य' (मांस) क्यों ? 'विकृत्त (कटे हुए) से उत्पन्न
होता है।' यह नैरुक्त लोग मानते हैं।
'अनवाय' क्या ? अनवयव या अवयवरहित। अथवा
जिसे अन्य (धूर्त्त के मित्र) हटाते हुए भी व्यवाय न कर
सकें (हटा न सकें)।
'किमीदिन्' क्या ? 'किमिदानीम्' (अब क्या होरहा है)
ऐसे करते रहने वाला। अथवा 'किमिदम्' 'किमिदम्' यह
क्या ? यह क्या ? करने वाला पिशुन धूर्त्त है।
'पिशुन' कैसे ? 'पिंश' (तु० प०) धातु से है। क्योंकि-
वह थोड़े पाप को भी बढ़ाता रहता है ॥ २ (११) ॥
(खं० ३)
निघ०- अमवान् ॥४५॥ अमीवा ॥४६॥
दुरितम्॥४७॥ अप्वे ॥४८॥ अमतिः॥४९॥
श्रुष्टी ॥५०॥ पुरन्धिः ॥५१॥