भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 690

हिन्दी निरुक्त ( २७६ ) ६ अ० ३ पा० ४ खं० कहलाता है, और जो असत्य नहीं, सो 'नासत्य' कहलाता है। दो बार निषेध करने से प्रकृत वस्तु ही हो जाती है। 'सत्य के प्रणेता (प्रवृत्त करने वाले) 'नासत्य' कहलाते हैं, यह आग्रायण आचार्य मानते हैं। अथवा—नासिका (नाक) से उत्पन्न हुये थे इस से वे नासत्य हैं। 'पुरन्धि' (५१) अनवगत अनेकार्थ है। 'पुरन्धि' क्या ? 'पुरु' (बहुत) 'धी' (बुद्धि) वाला । सो कौन मन्त्र में पहिले 'भग' देवता कहा गया है, उसी का यह पुनः कथन अर्थात्-विशेषण है। यह एक मत हुआ। दूसरा मत है कि-'पुरन्धि' इन्द्र का नाम है। क्योंकि-यह बहुत २ कर्म वाला है, और पुरों (मेघों) का विदारण करने (फाड़ने) वाला है। 'पुरन्धि' वरुण का नाम है, यह और मत है। उसी की यह विशेषण द्वारा स्तुति है, कि-वह 'पुरन्धि' या बहु बुद्धि वाला है। — "इमामूनु कवितमस्य मायाम् " अर्थात् 'इमाम्' इस 'कवितमस्य' (मेधावितमस्य) बड़े बुद्धिमान् वरुणदेव की 'मायाम्' प्रज्ञा को (न किरादधर्ष) कोई नहीं दबा सकता है, यह भी निगम है। इस प्रकार यहां वरुण देव प्रज्ञा के द्वारा स्तुति किये जाते हैं, और 'धी' यह नाम बुद्धि का है, सो जिसके 'पुरु' बहुत हो, उसे 'पुरन्धि' कहते हैं, इस से वरुण पुरन्धि है, युक्त होता है। 'रुशत्' (५२) यह अनवगत वर्ण का नाम है। ज्वलन (जलना) अर्थ में 'रुच' (भ्वा०आ०) धातु का है। "समिद्धस्य रुशद्दर्शि पाजः " अर्थात्-'समि-